शपथपत्र का शुल्क पांच गुना, पैतृक संपत्ति के बंटवारे और हक-त्याग विलेख पर भी बढ़ा आर्थिक बोझ
ऊना। हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा स्टाम्प शुल्क की दरों में की गई भारी वृद्धि पर पूर्व जिला परिषद सदस्य पंकज सहोड़ ने कड़ा आक्रोश व्यक्त करते हुए सरकार से इस फैसले को तत्काल वापस लेने की मांग की है। उन्होंने कहा कि सरकार को जनता की जेब से पैसा निकालने के नए-नए रास्ते तलाशने के बजाय आम नागरिकों को राहत देने की दिशा में काम करना चाहिए। राजस्व बढ़ाने के नाम पर गरीब, किसान, मजदूर और मध्यम वर्ग पर आर्थिक बोझ डालना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है। पंकज सहोड़ ने कहा कि शपथपत्र (Affidavit) का शुल्क ₹20 से बढ़ाकर सीधे ₹100 करना यानी पांच गुना वृद्धि करना आम नागरिकों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ है।
एक विद्यार्थी को छात्रवृत्ति के लिए, किसान को सरकारी योजना का लाभ लेने के लिए और सामान्य नागरिक को छोटे-छोटे प्रशासनिक कार्यों के लिए शपथपत्र की जरूरत पड़ती है। क्या अब सरकार आम आदमी की बुनियादी कानूनी जरूरतों को भी महंगा बनाना चाहती है? उन्होंने कहा कि पैतृक संपत्ति के पारिवारिक बंटवारे की अधिकतम शुल्क सीमा ₹1,000 से बढ़ाकर ₹5,000 करना और हक-त्याग विलेख (Relinquishment Deed) पर अधिकतम शुल्क सीमा समाप्त करना ग्रामीण परिवारों और किसानों के लिए गंभीर चिंता का विषय है। पैतृक संपत्ति का बंटवारा कोई विलासिता नहीं, बल्कि परिवारों की कानूनी आवश्यकता है।
सरकार को ऐसे मामलों में राहत देनी चाहिए, न कि परिवारों को अपनी ही जमीन का कानूनी हस्तांतरण करवाने के लिए भारी शुल्क चुकाने को मजबूर करना चाहिए। ऐसी आर्थिक बाधाएं परिवारों के बीच विवाद और मुकदमेबाजी को भी बढ़ावा दे सकती हैं। पंकज सहोड़ ने संपत्ति के विक्रय-करार (Agreement to Sell) पर बाजार मूल्य के 2 प्रतिशत अग्रिम स्टाम्प शुल्क की व्यवस्था पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि भले ही यह राशि बाद में बिक्री विलेख (Sale Deed) के समय देय स्टाम्प शुल्क में समायोजित होती हो, लेकिन शुरुआत में इतनी बड़ी रकम जमा करवाने की बाध्यता छोटे संपत्ति खरीदारों की आर्थिक क्षमता और नकदी पर सीधा दबाव डालती है। सरकार को यह समझना चाहिए कि हर व्यक्ति के पास लाखों रुपये की अतिरिक्त नकदी उपलब्ध नहीं होती।
उन्होंने कहा कि एक तरफ सरकार आम जनता को आर्थिक राहत देने और किसानों की आय बढ़ाने की बात करती है, वहीं दूसरी तरफ सामान्य कानूनी दस्तावेजों और पारिवारिक संपत्ति के हस्तांतरण को महंगा बनाया जा रहा है। सरकार को अपनी नीतियों में आम आदमी की वास्तविक आर्थिक स्थिति को प्राथमिकता देनी चाहिए। राजस्व बढ़ाने के लिए ऐसे फैसले नहीं होने चाहिए जिनका सबसे अधिक असर आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों पर पड़े।
पंकज सहोड़ ने मुख्यमंत्री एवं राजस्व मंत्री के समक्ष निम्नलिखित मांगें रखी हैं:
1. शपथपत्र पर बढ़ाया गया शुल्क तत्काल वापस लेकर पुरानी ₹20 की दर बहाल की जाए।
2. पैतृक संपत्ति के पारिवारिक बंटवारे के लिए पुरानी शुल्क सीमा बहाल की जाए।
3. हक-त्याग विलेख पर अधिकतम शुल्क सीमा पुनः निर्धारित की जाए, ताकि किसानों और सामान्य परिवारों पर असीमित आर्थिक बोझ न पड़े।
4. विक्रय-करार पर 2 प्रतिशत अग्रिम स्टाम्प शुल्क की व्यवस्था में छोटे संपत्ति खरीदारों को तत्काल राहत दी जाए।
5. किसानों, गरीब परिवारों, विद्यार्थियों और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए विशेष रियायती स्लैब लागू किए जाएं।
6. किरायेनामों और सामान्य करार सहित अन्य रोजमर्रा के कानूनी दस्तावेजों की फीस की समीक्षा कर आम जनता के अनुकूल दरें निर्धारित की जाएं।
पंकज सहोड़ ने सरकार को स्पष्ट संदेश देते हुए कहा कि जनता पर आर्थिक बोझ डालकर राजस्व बढ़ाने की नीति स्वीकार्य नहीं हो सकती। सरकार को जनभावनाओं का सम्मान करते हुए इन दरों में तत्काल कटौती करनी चाहिए। यदि सरकार ने इस जनहित के मुद्दे पर राहत नहीं दी, तो जनता, सामाजिक संगठनों और संबंधित विधिक मंचों के सहयोग से इस विषय को व्यापक स्तर पर उठाया जाएगा।
