1800 में तैयार किया मंदिर बना आकर्षण का केंद्र
जालंधर, ENS: दीपावली पर सजावट के लिए आधुनिक रंग-बिरंगी लाइटों और बिजली के अन्य उपकरणों के इस दौर में भी पारम्परिक मिट्टी के दीयों का महत्व बरकरार है। दशहरा के बाद दीप पर्व दीवाली की तैयारियां शुर होने के साथ ही कुम्हारों ने अपने घरों में दीए बनाने शुरू कर दिए और बाजार में त्योहार से पंद्रह दिन पहले ही दीए मिलने लगे थे। अपने परम्परागत उद्योग को कायम रखने के लिए आज भी कई कुम्हार दिन-रात मेहनत करते हैं और मिट्टी से बनी कई वस्तुएं आम जनता के सामने पेश करते हैं।
हालांकि इस फैशनेबल जमाने में मिट्टी के इन दीयों की जगह मोमबत्तियों और चाइनीज लाइटों ने ली है लेकिन दीवाली के दिन रौशनी और लक्ष्मी पूजन और देवी-देवताओं के चित्रों के सामने घी के दीए जलाने के लिए इन दीपकों की मांग अब भी बनी हुई है। वहीं सोफी गांव में दिवाली की तैयारियां जोरों पर हैं, कारीगर मिट्टी के दीयों और राम मंदिरों को खास लुक दे रहे हैं।
सदियों से कुम्हार का काम करने वाले कारीगरों को इस बार पिछले वर्षों की तुलना में अधिक काम मिल रहा है। लोगों में मिट्टी कलां के उत्पाद खरीदने के लिए भारी उत्साह है। इस बार रोशनी का त्योहार दिवाली 8 नवंबर को देश और दुनिया भर में श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। त्योहार के मौके पर जहां बाजारों में रौनक है। वहीं मिट्टी के दीये और अन्य सजावटी सामान बनाने वाले कारीगर भी दिन-रात काम में लगे हुए हैं। इसी तरह जालंधर कैंट से सटे गांव सोफी में भी दिवाली की तैयारियां जोरों पर चल रही हैं।
इस बार ग्राम सोफी में रहने वाले कुम्हार समाज के कारीगरों द्वारा विभिन्न डिजाइनों एवं आकर्षक स्वरूप में मिट्टी के दीपक तैयार किये जा रहे हैं। खास बात यह है कि इस बार कारीगरों ने दिवाली के त्योहार को ध्यान में रखते हुए मिट्टी के दीयों के साथ मिट्टी के राम मंदिर भी तैयार किए हैं। इसके अलावा विभिन्न कलात्मक और सजावटी स्वरूप भी बनाए गए हैं, जो लोगों के आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। कारीगर भोला राम ने बताया कि उनके द्वारा इस बार 1800 रुपए में मंदिर तैयार किए गए है, लेकिन उन्हें मिट्टी का पूरा मूल्य फिर भी नहीं मिलता। उनका कहना है कि दुकानदारों द्वारा उनसे 1800 रुपए में मंदिर खरीदा जाता है और उसके बाद इसे 10 हजार रुपए में बेचा जाता है। यही कारण है कि उन्हें मिट्टी की सही खरीद और मेहनत भी नहीं मिल पाती।
इस दौरान भोला ने कहा कि मिट्टी के बनाए मंदिर की आस्था के बारे में बताया कि घरों में मिट्टी के मंदिर की ही पूजा की जाती है। ऐसे में एक बार मंदिर को पूजने के बाद दूसरे साल मंदिर को बदलना भी जरूरी है। उन्होंने कहा कि अगर किसी का कच्चा घर है और पक्का बनाना है, वह फस्ट फ्लोर मंदिर की पूजा करें। अगर किसी ने दूसरी मंजिल का घर है, वह तीसरी मंजिल के मंदिर की पूजा करें। भोला ने कहा कि यह आस्था का प्रतीक है और उनके बुजुर्गों द्वारा आस्था के बारे में बताया गया है। उन्होंने कहा लोगों की मनोकामनाएं पूरी भी होती है और उनके पास हर साल लोग मंदिर लेने के लिए आते है। भोला ने कहाकि उनकी 6वीं से 7वीं पीढ़ी इस काम में लगी हुई है।
