GSHP की पांचवीं वार्षिक बैठक भी होगी आयोजित, जलवायु परिवर्तन, स्थानिक न्याय और सतत विकास पर होगा मंथन
ऊना,सुशील पंडित: राजकीय महाविद्यालय ऊना में 23 और 24 अक्टूबर, 2026 को राष्ट्रीय संगोष्ठी एवं जियोग्राफिकल सोसाइटी ऑफ हिमाचल प्रदेश (GSHP) की पांचवीं वार्षिक बैठक का आयोजन किया जाएगा। महाविद्यालय के भूगोल विभाग और हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय, शिमला के भूगोल विभाग के अंतर्गत कार्यरत GSHP के संयुक्त तत्वावधान में होने वाले इस कार्यक्रम में देशभर के शिक्षाविद्, शोधार्थी और भूगोल विशेषज्ञ भाग लेंगे।
संगोष्ठी का विषय ‘अनिश्चितता के दौर में भूगोल एवं अनुकूलनशील शासन व्यवस्था : आजीविका, स्थानिक न्याय और एक सुदृढ़ भारत’ रखा गया है। इसमें जलवायु परिवर्तन, पर्यावरणीय चुनौतियों, तेजी से बढ़ते शहरीकरण और सामाजिक-आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच भूगोल की भूमिका तथा प्रभावी शासन व्यवस्था की संभावनाओं पर चर्चा की जाएगी।
इस राष्ट्रीय संगोष्ठी को भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICSSR), नई दिल्ली और नेशनल एटलस एंड थीमैटिक मैपिंग ऑर्गनाइजेशन (NATMO), कोलकाता का प्रायोजन प्राप्त है। कार्यक्रम के दौरान आजीविका के स्थायी साधनों, प्राकृतिक संसाधनों तक समान पहुंच, स्थानिक न्याय और आपदा प्रबंधन जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विचार-विमर्श होगा। इसके साथ ही स्थानीय समुदायों के पारंपरिक ज्ञान और भौगोलिक सूचना प्रणाली (GIS) जैसी आधुनिक तकनीकों के प्रभावी उपयोग पर भी चर्चा की जाएगी।
संगोष्ठी में नेशनल एटलस एंड थीमैटिक मैपिंग ऑर्गनाइजेशन (NATMO), कोलकाता के निदेशक डॉ. बिनोद कुमार को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया है। वहीं, काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU), वाराणसी के विज्ञान संस्थान के भूगोल विभाग के प्रोफेसर डॉ. नरेंद्र कुमार राणा मुख्य वक्ता के रूप में अपने विचार रखेंगे।
कार्यक्रम का उद्देश्य समकालीन भौगोलिक चुनौतियों के समाधान तलाशने के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण, सतत विकास और सामाजिक समावेशन को बढ़ावा देने के लिए अकादमिक संवाद को मजबूत करना है। इस दौरान विभिन्न संस्थानों के विशेषज्ञ अपने शोध और अनुभव साझा करेंगे, जिससे भूगोल के क्षेत्र में नए विचारों और शोध संभावनाओं को आगे बढ़ाने का अवसर मिलेगा।
राजकीय महाविद्यालय ऊना में आयोजित होने वाली यह संगोष्ठी शोधार्थियों और विशेषज्ञों को एक साझा मंच प्रदान करेगी। साथ ही, बदलते पर्यावरणीय और सामाजिक परिदृश्य में आजीविका के संरक्षण, संसाधनों के न्यायसंगत वितरण और एक सुदृढ़ भारत के निर्माण से जुड़े मुद्दों पर सार्थक चर्चा का मार्ग प्रशस्त करेगी।
