जलवायु परिवर्तन और सतत विकास की चुनौतियों के समाधान में भूगोल की भूमिका अहम
ऊना: जलवायु परिवर्तन, पर्यावरणीय असंतुलन और प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ते दबाव के वर्तमान दौर में भूगोल की भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण हो गई है। विकास की योजनाओं को सफल बनाने के लिए भौगोलिक परिस्थितियों, पर्यावरणीय संतुलन और स्थानीय समुदायों की आवश्यकताओं को समझना आवश्यक है। इसी उद्देश्य को केंद्र में रखते हुए राजकीय महाविद्यालय ऊना में शुक्रवार को दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी एवं जियोग्राफिकल सोसाइटी ऑफ हिमाचल प्रदेश (GSHP) की पाँचवीं वार्षिक बैठक का शुभारंभ हुआ। संगोष्ठी का विषय “अनिश्चितता के दौर में भूगोल एवं अनुकूलनशील शासन व्यवस्था : आजीविका, स्थानिक न्याय और एक सुदृढ़ भारत” है।
राजकीय महाविद्यालय ऊना के भूगोल विभाग तथा हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय, शिमला के भूगोल विभाग के अंतर्गत कार्यरत जियोग्राफिकल सोसाइटी ऑफ हिमाचल प्रदेश के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस राष्ट्रीय संगोष्ठी को भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICSSR), नई दिल्ली तथा नेशनल एटलस एंड थीमैटिक मैपिंग ऑर्गनाइजेशन (NATMO), कोलकाता द्वारा प्रायोजित किया गया है। इसमें देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों और शैक्षणिक संस्थानों से आए शिक्षाविदों, भूगोल विशेषज्ञों और शोधार्थियों ने भाग लिया।
कार्यक्रम का शुभारंभ अतिथियों के स्वागत के साथ हुआ। मुख्य अतिथि डॉ. बिनोद कुमार सिंह, निदेशक, NATMO, कोलकाता का पुष्प भेंट कर स्वागत किया गया तथा उन्हें हिमाचली टोपी और शॉल पहनाकर सम्मानित किया गया। मुख्य वक्ता प्रो. नरेंद्र कुमार राणा सहित मंचासीन अतिथियों और विभिन्न संस्थानों से आए विद्वानों का भी पारंपरिक हिमाचली रीति से अभिनंदन किया गया।
महाविद्यालय की प्राचार्या एवं संरक्षक डॉ. मीता शर्मा ने अपने स्वागत वक्तव्य में कहा कि देश के प्रतिष्ठित शिक्षाविदों और विशेषज्ञों की उपस्थिति महाविद्यालय के लिए गर्व का विषय है। उन्होंने इस आयोजन को शोध, ज्ञान के आदान-प्रदान और अकादमिक सहयोग को प्रोत्साहित करने वाला महत्त्वपूर्ण मंच बताया। संगोष्ठी की संयोजक डॉ. नविता शर्मा ने अतिथियों का औपचारिक स्वागत करते हुए कार्यक्रम की अवधारणा और उद्देश्य प्रस्तुत किए।
GSHP के महासचिव डॉ. बी. आर. ठाकुर ने सोसाइटी की वार्षिक रिपोर्ट प्रस्तुत की। GSHP के अध्यक्ष डॉ. डी. डी. शर्मा ने अपने संबोधन में भूगोल के अकादमिक महत्त्व और समकालीन चुनौतियों के अध्ययन में इसकी भूमिका को रेखांकित किया। संरक्षक प्रो. बी. एस. मार्ह ने भी अपने विचार साझा किए। इस अवसर पर संगोष्ठी की एब्स्ट्रैक्ट बुक का विमोचन किया गया।
मुख्य वक्ता प्रो. नरेंद्र कुमार राणा और मुख्य अतिथि डॉ. बिनोद कुमार सिंह ने अपने संबोधनों में वर्तमान समय में भूगोल की बढ़ती प्रासंगिकता पर बल दिया। वक्ताओं ने कहा कि जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक आपदाओं, पर्यावरणीय असंतुलन और प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ते दबाव जैसी चुनौतियों का सामना करने के लिए भूगोल आधारित समझ आवश्यक है। भौगोलिक अध्ययन मानव और प्रकृति के बीच संबंधों को समझने के साथ-साथ क्षेत्रीय समस्याओं की पहचान और उनके समाधान के लिए प्रभावी रणनीतियाँ तैयार करने में भी सहायक है।
वक्ताओं ने पर्यावरण संरक्षण के साथ विकास को सतत बनाए रखने की आवश्यकता पर विशेष जोर दिया। उन्होंने रेखांकित किया कि विकास का उद्देश्य केवल आर्थिक प्रगति नहीं, बल्कि प्राकृतिक संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग, पर्यावरणीय संतुलन, आजीविका की सुरक्षा और सामाजिक समानता भी होना चाहिए। विकास की योजनाओं में स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों तथा समुदायों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर ही दीर्घकालीन परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं। सतत विकास की अवधारणा वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं को पूरा करने के साथ भावी पीढ़ियों के हितों और संसाधनों की रक्षा करने से भी जुड़ी है।
यंग जियोग्राफर अवॉर्ड प्रतियोगिता आयोजित
संगोष्ठी के अंतर्गत यंग जियोग्राफर अवॉर्ड प्रतियोगिता के तृतीय चरण का आयोजन किया गया। प्रतियोगिता में पाँच प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। उपलब्ध परिणाम-पत्र के अनुसार जाह्नवी ठाकुर ने 57 अंक, नितिन राठी ने 56 अंक, निहारिका ने 54 अंक, इश्तियाक अहमद ने 52 अंक तथा दिलावर हुसैन ने 51 अंक प्राप्त किए। प्रतियोगिता का मूल्यांकन प्रो. राजेश्वरी जगलान, डॉ. विश्वा बी. एस. चंदेल तथा प्रो. शुभकांत महापात्र ने किया। इस पहल का उद्देश्य युवा भूगोलवेत्ताओं की शोध प्रतिभा को प्रोत्साहित करना और भूगोल के क्षेत्र में अकादमिक उत्कृष्टता को बढ़ावा देना है।
विशेषज्ञ पैनल चर्चा और शोध-पत्र प्रस्तुतियाँ
कार्यक्रम के अंतर्गत आयोजित पैनल चर्चा में प्रो. राजेश्वरी जगलान, प्रो. अश्विनी लूथरा, प्रो. शुभकांत महापात्र तथा डॉ. संजीव शर्मा ने भाग लिया। चर्चा में भूगोल, विकास नियोजन और समकालीन सामाजिक-पर्यावरणीय चुनौतियों से जुड़े विषयों पर विचार-विमर्श किया गया।
संगोष्ठी के तकनीकी सत्रों में जलवायु परिवर्तन, सतत कृषि, जल संसाधन प्रबंधन, प्रवासन, ग्रामीण आजीविका, लैंगिक असमानता, आपदा प्रबंधन और भौगोलिक सूचना प्रणाली जैसे विषयों पर शोध-पत्र प्रस्तुत किए गए। इन शोधों के माध्यम से पर्यावरणीय जोखिमों को समझने, स्थानीय आजीविका को सुरक्षित बनाने तथा संसाधनों के न्यायसंगत वितरण की संभावनाओं पर चर्चा की गई।
कार्यक्रम के आयोजन में संयोजक डॉ. नविता शर्मा, सह-संयोजक डॉ. सनी शर्मा, आयोजन सचिव प्रो. विकास सैनी तथा आयोजन समिति के अन्य सदस्यों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। दो दिवसीय संगोष्ठी का उद्देश्य भूगोल के क्षेत्र में नवीन शोध को प्रोत्साहित करना तथा पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक न्याय और सतत विकास की दिशा में अकादमिक संवाद को मजबूत बनाना है। इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में लगभग 200 विषय विशेषज्ञों ने भाग लिया। स्थानीय महाविद्यालय के सभी प्राध्यापकगण उपस्थित रहे।