ऊना (सुशील पंडित)। दशहरे के बाद अब करवाचौथ की तैयारियां जोरों पर हैं। करवाचौथ पर हर सुहागिन अपने पति के दीर्घायु एवं बेहतर स्वास्थ्य के लिए निर्जल व्रत रखती हैं। इसमें करवा का महत्व सदियों से बरकरार है।करवाचौथ को अब महज कुछ ही दिन शेष हैं जिसे देखते हुए कुम्हार भी अपनी चाक को दुगनी गति देते हुए करवे के स्टोक को तैयार करने में दिन रात की मेहनत में मशगूल हैं। हालांकि बाजारों में पीतल, स्टील और तांबे के करवे भी चलन में रहे हैं। लेकिन परंपरागत मिट्टी के करवो को महिलाएं तरजीह दे रही हैं।

बाजार के माहोल को देखते हुए कुम्हार दिन रात करवो को स्टोक करने में जुट गए हैं। मिट्टी के डिजाइनर करवों की एडवांस में डिमांड भी है जिसे पूरा करने में कुम्हार दिन रात जुटे हैं।सत्तर वर्षीय कुम्हार अमरनाथ बताते हैं की दस दशक से वह इस परंपरा को संजोए हुए हैं। पिछले कुछ वर्षों का अनुभव मन को व्यथित करता है मगर इस वर्ष माहोल को देखते हुए आस जगी है।इस बार दीवाली पर अच्छे दिनों की उम्मीद है।
मिट्टी के करवे को बनाने के लिए चिकनी मिट्टी की आवश्कता होती है। पानी और मिट्टी को गूथ कर रख हुआ है। चाक की चकरी पर पानी से सनी हुई मिट्टी को रख कर हाथों से करवे को आकर दिया जाता है। चाक पर करवा बनाने में दो मिनट का समय लगता है। अमरनाथ के पुत्र विपिन कुमार बताते हैं की वे भी अपने पिता के साथ दिन रात करवो के स्टोक को एकत्रित करने में जुटे हैं। इस काम में उनका बेटा और बेटी भी पढ़ाई से अलग समय निकाल कर हाथ बटाते हैं।
विपिन बताते हैं की चाक की चकरी से करवा उतारने के बाद करवे में एक छेद किया जाता हैं ।इसके बाद करवों को धूप और हवा में सूखने के लिए रख देते हैं। सूखने के बाद परिवार के सदस्य सभी करवों को आग में तपा कर पक्का करते हैं। पक्का होने के बाद उस पर रंग रोगन किया जाता है। कई करवों को लेस, शीशे और मोतियों से भी सजाया जाता है। मिट्टी के करवे की कीमत 20 रुपये से लेकर 50 रुपये तक है।जबकि साइज रंगाई और विशिष्टता के आधार पर कीमत 100से लेकर 150रुपए तक भी बाजार में उपलब्ध है।

