डिजिटल किसान रजिस्ट्री में राजस्व रिकॉर्ड का सही समन्वय न होने से कानूनी वारिस सरकारी योजनाओं के लाभ से हो रहे प्रभावित
ऊना। पूर्व जिला परिषद सदस्य पंकज सहोड़ ने हिमाचल प्रदेश में डिजिटल किसान रजिस्ट्री (AgriStack) के तहत किसान आईडी (Farmer ID) बनाने में आ रही तकनीकी एवं प्रशासनिक बाधाओं पर गंभीर चिंता जताते हुए केंद्र और प्रदेश सरकार से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। उन्होंने कहा कि डिजिटल इंडिया और कृषि के आधुनिकीकरण के उद्देश्य तभी सार्थक होंगे, जब तकनीकी प्रक्रियाओं के कारण वास्तविक किसानों और उनके कानूनी वारिसों को सरकारी योजनाओं के लाभ से वंचित न होना पड़े। प्रेस को जारी बयान में पंकज सहोड़ ने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में परिवार के मुखिया या भूमि मालिक की मृत्यु के बाद उनकी भूमि कानूनी वारिसों के नाम हस्तांतरित करवाने के लिए राजस्व विभाग में फौती इंतकाल की प्रक्रिया पूरी की जाती है।
कई मामलों में इंतकाल विधिवत स्वीकृत भी हो चुका होता है, लेकिन नियमित जमाबंदी में डिजिटल रिकॉर्ड अपडेट और सिंक होने तक ऑनलाइन पोर्टल पर भूमि मृतक के नाम ही प्रदर्शित होती रहती है। उन्होंने कहा कि इस तकनीकी विसंगति के कारण कानूनी वारिसों के पास भूमि हस्तांतरण का वैध राजस्व प्रमाण होने के बावजूद उनकी किसान आईडी जनरेट नहीं हो पाती। यह स्थिति उन परिवारों के लिए विशेष रूप से परेशानी का कारण बन रही है, जो कृषि पर निर्भर हैं और सरकारी कृषि एवं बागवानी योजनाओं का लाभ लेना चाहते हैं। पंकज सहोड़ ने कहा कि भारत सरकार की एग्रीस्टैक (AgriStack) व्यवस्था के अंतर्गत किसान रजिस्ट्री का राज्य के डिजिटल भू-अभिलेखों से समन्वय आवश्यक है। हिमाचल प्रदेश में हिमभूमि पोर्टल के राजस्व रिकॉर्ड और किसान रजिस्ट्री के बीच डेटा अपडेट में देरी या तकनीकी असंगति के कारण पात्र किसानों को अनावश्यक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि इस समस्या के समाधान के लिए केंद्र और प्रदेश सरकारों के संबंधित विभागों को संयुक्त रूप से जिम्मेदारी निभानी होगी। प्रदेश का राजस्व विभाग भूमि रिकॉर्ड और इंतकाल के संधारण के लिए जिम्मेदार है, कृषि विभाग किसान रजिस्ट्री के क्रियान्वयन से जुड़ा है, जबकि केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय को राष्ट्रीय स्तर पर तकनीकी मानकों और डिजिटल समन्वय में आवश्यक सहयोग देना चाहिए। पंकज सहोड़ की प्रमुख मांगें 1. राजस्व और किसान रजिस्ट्री का डिजिटल समन्वय: केंद्रीय कृषि मंत्रालय, हिमाचल प्रदेश के राजस्व विभाग और सूचना प्रौद्योगिकी विभाग की संयुक्त तकनीकी टीम गठित कर डेटा सिंक्रोनाइजेशन की समस्या का समयबद्ध समाधान किया जाए। 2. स्वीकृत फौती इंतकाल को मान्यता: राजस्व विभाग द्वारा विधिवत सत्यापित एवं स्वीकृत इंतकाल को किसान आईडी बनाने के लिए वैध दस्तावेजी आधार स्वीकार किया जाए।
3. अंतरिम डिजिटल पहचान की सुविधा: नियमित जमाबंदी अपडेट होने तक पात्र कानूनी वारिसों को स्वीकृत इंतकाल और प्रमाणित राजस्व रिकॉर्ड के आधार पर अंतरिम डिजिटल प्रविष्टि की सुविधा दी जाए। 4. वैकल्पिक सत्यापन व्यवस्था: ऑनलाइन पोर्टल में तकनीकी समस्या होने पर हलका पटवारी अथवा सक्षम राजस्व अधिकारी के सत्यापन के आधार पर किसान आईडी बनाने की अनुमति दी जाए। 5. पीएम-किसान सम्मान निधि की विशेष समीक्षा: भूमि रिकॉर्ड में डिजिटल मिसमैच अथवा वरासत अपडेट न होने के कारण जिन पात्र किसानों की पीएम-किसान सम्मान निधि प्रभावित हुई है, उनके मामलों की विशेष समीक्षा कर नियमानुसार शीघ्र समाधान किया जाए। पंकज सहोड़ ने कहा कि सरकारों को यह समझना होगा कि डिजिटल व्यवस्था किसानों की सुविधा के लिए बनाई गई है, न कि उनके लिए नई बाधाएं खड़ी करने के लिए।
तकनीकी सुधार और विभागीय समन्वय की कमी का खामियाजा उन परिवारों को नहीं भुगतना चाहिए, जिन्होंने कानूनी प्रक्रिया के तहत भूमि अपने नाम करवाने के सभी आवश्यक कदम पूरे कर लिए हैं। उन्होंने केंद्र एवं प्रदेश सरकार से मांग की कि इस विषय पर स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जाएं, सभी जिलों में लंबित मामलों की पहचान की जाए और किसान आईडी बनाने की प्रक्रिया को सरल, पारदर्शी एवं समयबद्ध बनाया जाए, ताकि कोई भी पात्र किसान या कानूनी वारिस तकनीकी खामियों के कारण अपने अधिकारों और सरकारी योजनाओं के लाभ से वंचित न रहे।
