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संतो के मिलने से ही प्रभु भक्ति की धारा उत्पन्न होती है: आचार्य तरुण डोगरा

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झंबर में रामकथा के बीच आचार्य तरुण डोगरा ने भक्तजनों को जीवन में प्रभु सिमरन करते रहने का किया आह्वान 

ऊना/सुशील पंडित: जिला उपमंडल ऊना स्थित ग्राम पंचायत झंबर में चल रहे वार्षिक धार्मिक अनुष्ठान में श्रीरामकथा महाज्ञान गंगा की धारा बहाते हुए क्षेत्र के सुप्रसिद्ध कथावाचक आचार्य तरुण डोगरा ने असंख्या में बैठे भक्तजनों को श्री रामायण का मूल भाव बताते हुए इस मानव रूपी जीवन में प्रभु का सिमरन करते रहने का आह्वान किया। उन्होने उपस्थित सभी श्रोताओं को इस महाकुंभ में स्नान करने पर कहा कि जिसने भी इस महायज्ञ में श्रीराम कथा एवं यहां पर पहुंचे विभिन्न मठों के संतो व महान महापुरूषों द्वारा जो कुछ भी सुना है, उसे हमें भूलना नहीं चाहिए। हमें भगवान को ह्रदय की जोत जगाकर याद करना चाहिए, क्योंकि वह हमारे स्वयं के ह्रदय में वास करते हैं। उन्होंने कहा कि जीवन में अपने संबंधों का निर्वहन करने हेतु हमें सबके समक्ष झुक जाना चाहिए, किन्तु राष्ट्र धर्म, संस्कृति एवं इंसानियत के मानबिन्दुओं के साथ कोई समझौता कभी नहीं करना चाहिए। क्योंकि समस्त धर्म की रक्षा करना ही अपने मानबिन्दुओं का सम्मान है। उन्होंने बताया कि सुख बाहर की नहीं, भीतर की संपदा है। यह संपदा धन से नहीं, धैर्य से प्राप्त होती है। हमारा सुख इस बात पर निर्भर नहीं करता कि हम कितने धनवान है, अपितु इस बात पर निर्भर करता है कि हम कितने धैर्यवान हैं। सुख और प्रसन्नता हम सबकी सोच पर निर्भर करती है।

आचार्य तरुण डोगरा ने  अपने मुखरविंद से अमृत बर्षा करते हुए कहा कि हमें अपने जीवन को सुधारने का प्रयास करना चाहिए और हमें इसी जन्म में अपने अगले जन्म को सुधार लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि हमारे हाथ में ही हमारा जीवन है हम उसे किस तरह जीते है और क्या कर्म करते है, इस पर ही हमारा अगला जन्म होता है। उन्होने कहा कि साधु संत ही हमें सच्चा मार्ग दिखाते हैं और संतो का सानिध्य सहज नहीं मिलता। हमें प्रभु भजन करने के लिए ही भगवान ने इस धरती पर जन्म देकर भेजा है। जब हम भजन करेगें तो भगवान हमें अवश्य ही मुक्ति देगें। उन्होने बताया कि रामायण से हमें जीने की सीख मिलती है और श्रीमदभागवत कथा हमें मरना सीखती है। क्योंकि ये मानव जीवन एक हवा का झोंका है जो आता है और चला जाता है। यदि हम चाहते हैं कि हमारा भगवान से मिलन से हो, तो हमें अपनी मृत्यु से डरना नहीं चाहिए। यदि हम कहीं भी रामकथा या भागवत कथा सुनने आते हैं तो हमें वहां से परम सौभाग्य लेकर जाना चाहिए। उन्होने बताया कि भगवान की प्रथा है कि संतो के मिलने से ही प्रभु भक्ति की धारा उत्पन्न होती है और वह समय इतना अनमोल होता है कि भगवान भी इसकी कीमत नहीं चुका सकते। भगवान की भक्ति करने का एकमात्र यही रास्ता है कि हम कथा सुनने के माध्यम से ही भगवान के साक्षात दर्शन कर सकते हैं। 

उन्होने कहा कि हम कथा सुनते हैं और चले जाते हैं लेकिन भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण ही एकमात्र हमारा सहारा है जो हमारी नैया पार कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि भक्तों का लक्ष्य ज्ञान नहीं बल्कि प्रेम है, भक्तों के प्रेम में भगवान खुद बंध जाते हैं। उन्होने बताया कि इस संसार पर हम स्वंय ही हावी हो चुके हैं और भगवान का नाम लेने से संकोच करते हैं। इसका कारण हम स्वंय नहीं यह सब कलयुग का प्रकोप है। क्योंकि ब्रह्मा द्वारा वेदों में यह लिखा भी गया है कि कलयुग में लोग पुण्य कम और पाप ज्यादा करेगें। उसी का परिणाम आज हम देख और सुन भी रहे हैं। उन्होने आज की युवा पीढ़ी को कथा के माध्यम से अच्छे कर्म करने का आग्रह भी किया। इस दौरान उन्होंने उपस्थित श्रोताओं को भक्तिमय संगीत से प्रभुभक्ति में मंत्रमुग्ध कर दिया।

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