नई दिल्ली: अमेरिका और ईरान के बीच प्रस्तावित युद्धविराम समझौते को लेकर इजरायल में व्यापक अंसतोष देखने को मिल रहा है। राजनीतिक दलों, सुरक्षा विशेषज्ञों और विपक्षी नेताओं का कहना है कि यह समझौता ईरान के परमाणु कार्यक्रम, बैल्सिटिक मिसाइलों और उसके समर्थित संगठनों जैसे हिज्बुल्लाह, हमास और हूती से जुड़ी सुरक्षा खतरों का पर्याप्त समाधान नहीं करता है। आलोचकों का मानना है कि यह समझौता इजरायल की सुरक्षा चिंताओं को नजरअंदाज करता है। ईरान को आर्थिक राहत देने का रास्ता खोल सकता है।
बैड डील बना इजरायल में सबसे बड़ा मुद्दा
इजरायल के लोकप्रिय हिब्रू दैनिक समाचार पत्र येदियोट अहरोनोत ने रविवार को अपनी मुख्य खबर की हेडलाइन सिर्फ दो शब्दों में दी बैड डील यह शीर्षक इजरायल में इस समझौते को लेकर मौजूद व्यापक असंतोष को दर्शाता है। पिछले एक वर्ष में इजरायल ने ईरान के खिलाफ दो युद्ध लड़े हैं। इनमें से हालिया सैन्य अभियान फरवरी के अंत में अमेरिकी बलों के साथ से शुरु किया गया था। अब जब अमेरिका और ईरान शांति समझौते की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं तो इजरायल खुद को इस पूरी प्रक्रिया से बाहर महसूस कर रहा है।
समझौते के शुरुआती बिंदुओ पर ही उठे सवाल
समझौते की आधिकारिक घोषणा से पहले मीडिया में सामने आई जानकारियों ने इजरायल ने आलोचनाओं की बाढ़ ली है। अमेरिकी और ईरानी अधिकारियों के अनुसार, प्रारंभिक समझौते के अंतर्गत ईरान होर्मुज जलडमरुमध्य को फिर से खोलेगा जबकि अमेरिका ईरान बदंरगाहों पर लगी अपनी नाकाबंदी हटाएगा। इसके अलावा अप्रैल में हुए 60 युद्धविराम को 60 दोनों के लिए बढ़ाया जाएगा। इस अवधि में दोनों पक्ष ईरान के परमाणु कार्यक्रम और अमेरिकी प्रतिबंधों को हटाने जैसे मुद्दों पर विस्तृत बातचीत करेंगे।
इजरायल के मुल लक्ष्य पूरे नहीं होने का आरोप
इजरायल का कहना है कि यह समझौता उन लक्ष्यों से काफी पीछे है जिन्हें उसने युद्ध की शुरुआत में तय किया था। पीएम बेंजामिन नेतन्याहू ने उस समय कहा था कि उद्देश्य इजरायल के सामने मौजूद अस्तित्वगत खतरों को समाप्त करना है। नेतन्याहू के अनुसार, इसका मतलब ईरान के परमाणु खतरे और बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम को खत्म करना तथा ऐसी परिस्थितियां बनाना था जिसेस ईरानी जनता अपनी सरकार को बदल सके। इजरायल लंबे समय से यह भी मांग करता रहा है कि ईरान हिज्बुल्लाह, हमास और हूती जैसे संगठनों को समर्थन देना बंद करें।
एक्सपर्ट्स ने दिया काम
पूर्व कार्यवाहक राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जैकब नागेल ने कहा कि सार्वजनिक रुप से सामने आई जानकारी में ईरान की बैलिस्टिक मिसाइलों और क्षेत्रीय संगठनों को मिलने वाले समर्थन का कहीं जिक्र तक नहीं है। उन्होंने कहा कि भविष्य की बातचीत के लिए मुद्दे तय करना आसान है लेकिन इजरायल की सबसे बड़ी चिंताओं को समझौते का हिस्सा नहीं बनाया गया है।
विपक्ष ने बताया सुरक्षा नीति की बड़ी विफलता
पूर्व रक्षा मंत्री और दक्षिणपंथी नेता एविग्डोर लिबरमैन ने इस समझौते को इजरायल के लिए आपदा बताया है। कभी नेतन्याहू के सहयोगी रहे लिबरमैन अब उनके कट्टर आलोचकों में गिने जाते हैं। वहीं विपक्ष के नेता और पूर्व मंत्री यायर लापिड ने कहा कि यदि समझौते की खबरें सही हैं तो यह इजरायल की विदेश और सुरक्षा नीति की सबसे बडी़ विफलताओं में से एक होगी।
नेतन्याहू की सीमित प्रतिक्रिया
मौजूदा इजरायली सरकार के अधिकांश नेताओं ने इस मुद्दे पर खुलकर टिप्पणी नहीं की है। माना जा रहा है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को नाराज नहीं करना चाहते। प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने शुक्रवार को सिर्फ इतना कहना कि जब तब प्रधानमंत्री है। ईरान परमाणु हथियार हासिल नहीं कर पाएगा। उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर उनकी और ट्रंप की पूरी सहमति है हालांकि उनके बयान में बैलिस्टिक मिसाइलों या ईरान समर्थित संगठनों का कोई उल्लेख नहीं था।
इजरायल की तीन बड़ी चिंताएं
समझौते से जुड़े एक इजरायली अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि इजरायल की मुख्य चिंताएं तीन हैं।
. पहली ईरान के संवर्धित यूरेनियम भंडार के भविष्य को लेकर कोई स्पष्ट व्यवस्था नहीं है और परमाणु कार्यक्रम पर पर्याप्त नियंत्रण नहीं दिखता है।
. दूसरी समझौता ईरान सरकार को कमजोर करने की जगह। उसे आर्थिक रुप से मजबूत कर सकता है क्योंकि प्रतिबंधों में राहत मिलने पर पैसा फिर से ईरान तक पहुंचने लगेगा।
. तीसरी इसमें ऐसा कोई स्पष्ट तंत्र नहीं है जो ईरान को उसके समर्थित संगठनों की मदद रोकने के लिए मजबूर कर सके।
हिज्बुल्लाह के खिलाफ अभियान पर भी असर की आशंका
समझौते के कारण लेबनान में हिज्बुल्लाह के खिलाफ इजरायल के सैन्य अभियान पर भी असर पड़ सकता है। लेबनान में हालिया संघर्ष उस समय शुरु हुआ था। जब फरवरी में अमेरिका इजरायल और ईरान के बीच युद्ध छिड़ने के कुछ दिनों बाद हिज्जबुलल्लाह ने इजरायल पर हमला किया था। ईरान लगातार मांग करता रहा है कि व्यापक शांति समझौते में लेबनान संघर्ष को भी शामिल किया जाए। इजरायल इस मुद्दे को अलग रखना चाहता था लेकिन उसकी स्थिति कमजोर पड़ती दिखाई दे रही है।
चुनाव से पहले बढ़ा नेतन्याहू पर दबाव
इजरायल में अक्टूबर तक राष्ट्रीय चुनाव होने की संभावना है। ऐसे में नेत्याहू पर उनकी गठबंधन सरकार और विपक्ष दोनों तरफ से दबाव बढ़ रहा है कि वे ट्रंप प्रशासन की शर्तों के आगे न झुके हालांकि नेतन्याहू सार्वजनिक रुप से ट्रंप का विरोध करने से बच रहे हैं क्योंकि अमेरिका के साथ उनके करीबी संबंध उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक ताकतों में से एक माने जाते हैं।
