#BBMB पर हिमाचल प्रदेश को बड़ी राहत : कुमार सुमीत शर्मा
ऊना। आज यहां मीडिया से अनोपचारिक बातचीत में भाजपा प्रदेश सचिव कुमार सुमीत शर्मा ने हिमाचल प्रदेश के अधिकारों की दशकों पुरानी लड़ाई में 6 नवम्बर 2026 को माननीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए निर्णय को ऐतिहासिक और हिमाचली सम्मान से जुड़ा हुआ करार दिया है। उन्होंने कहा कि यह फैसला केवल बिजली के बकाया हिस्से का मामला नहीं, बल्कि हिमाचल प्रदेश के वैधानिक अधिकारों और न्याय की लड़ाई का महत्वपूर्ण पड़ाव है।
क्या है सुप्रीम कोर्ट का फैसला? 1. वर्ष 2011 के सुप्रीम कोर्ट के निर्णय में हिमाचल प्रदेश का #BBMB परियोजनाओं में 7.19% हिस्सा निर्धारित किया गया था। 2. अब सुप्रीम कोर्ट ने नरेन्द्र मोदी सरकार के अटॉर्नी जनरल द्वारा प्रस्तुत गणना को स्वीकार करते हुए कुल 13,066 मिलियन यूनिट बिजली के बकाये को आधार माना है। 3.हिमाचल सरकार की ₹420.77 करोड़ की पूंजीगत लागत की देनदारी समायोजित करने के बाद लगभग 11,973 मिलियन यूनिट बिजली हिमाचल को मिलनी है। 4. पंजाब और हरियाणा को अगले 20 वर्षों तक प्रत्येक वर्ष लगभग 598 मिलियन यूनिट बिजली अक्टूबर से मार्च के बीच हिमाचल को उपलब्ध करवानी होगी।
मोदी सरकार की सकारात्मक भूमिका केंद्र सरकार के ऊर्जा मंत्रालय और भारत सरकार के अटॉर्नी जनरल ने वर्षों से लंबित विवाद के समाधान के लिए विस्तृत गणना और व्यावहारिक प्रस्ताव प्रस्तुत किया। CAG से ऋण एवं पुनर्भुगतान के आंकड़े लेकर समाधान का ढांचा तैयार किया गया। सुप्रीम कोर्ट ने भी अटॉर्नी जनरल के निरंतर प्रयासों की सराहना की।
हरियाणा सरकार का सकारात्मक रुख: मुख्यमंत्री नायब सैनी के नेतृत्व वाली हरियाणा सरकार ने केंद्र सरकार के प्रस्ताव पर सैद्धांतिक सहमति जताई। सुप्रीम कोर्ट में हरियाणा ने 15 वर्षों में बकाया बिजली देने के प्रस्ताव पर आपत्ति नहीं की और समाधान की प्रक्रिया में सहयोग किया।
पंजाब की भगवंत मान सरकार का रुख रहा नकरात्मक: इसके विपरीत, पंजाब सरकार ने केंद्र सरकार की गणना पर आपत्तियां उठाईं। 13,066 मिलियन यूनिट की गणना घटाकर 11,094 मिलियन यूनिट करने, पूंजीगत लागत के समायोजन की दर और भुगतान की अवधि 30 वर्ष करने जैसे तर्क प्रस्तुत किए। माननीय सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब सरकार की इन आपत्तियों को अस्पष्ट एवं सतही बताते हुए स्वीकार नहीं किया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि पहले से तय अधिकारों को दोबारा विवादित नहीं बनाया जा सकता। अब हिमाचल का हक न्यायालय के आदेश से सुनिश्चित हुआ है। हिमाचल प्रदेश का 7.19% हिस्सा उसका अधिकार है। हिमाचल की भूमि, संसाधनों और जनता के हितों का सम्मान होना चाहिए। राजनीतिक मतभेद अपनी जगह हैं, लेकिन प्रदेश के अधिकारों के मामले में कोई समझौता नहीं होना चाहिए और समस्त पूर्व सरकारों के प्रयासों को इस जीत मे समायोजित करना चाहिए।
