नई दिल्ली। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शुक्रवार को एक कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर कर रूस की अर्थव्यवस्था को निशाना बनाने वाले व्यापक प्रतिबंधों पर फिलहाल रोक लगा दी। उन्होंने अमेरिकी संसद (कांग्रेस) को बताया कि यह फैसला अमेरिका के राष्ट्रीय हित में लिया गया है। अक्टूबर की शुरुआत में कानून बने ‘लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट, 2026’ के तहत अमेरिका को भारत पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार मिला था। ट्रंप का यह फैसला ऐसे समय में आया है, जब उन्होंने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ एक समझौते की घोषणा की है। इसके तहत रूस दुनिया भर में ऊर्जा की कीमतें कम करने में मदद के लिए डीजल की आपूर्ति करेगा। ट्रंप ने कहा कि रूस शुरुआत में 3 लाख टन से अधिक डीजल भेजेगा।
इसके बाद नवंबर और आने वाले महीनों में भी इसकी आपूर्ति जारी रहेगी। रूस की कमाई रोकने के लिए ऊर्जा और रक्षा उद्योग पर निशाना इस कानून को अमेरिकी संसद के प्रतिनिधि सभा और सीनेट, दोनों में बड़े बहुमत से मंजूरी मिली थी। इसका नाम दक्षिण कैरोलिना के सीनेटर लिंडसे ग्राहम के नाम पर रखा गया था। इस कानून का मकसद रूस की ऊर्जा और रक्षा से जुड़ी कंपनियों के साथ ही उसके उन तेल टैंकरों के बेड़े पर भी कार्रवाई करना था, जिनका इस्तेमाल प्रतिबंधों से बचकर तेल की ढुलाई के लिए किया जाता है। इस बेड़े को रूस का ‘शैडो फ्लीट’ कहा जाता है। इन कदमों के जरिये यूक्रेन में जारी युद्ध के लिए रूस को मिलने वाली आमदनी पर रोक लगाने की कोशिश की गई थी। इस कानून के तहत अमेरिका को भारत और चीन समेत उन देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार भी दिया गया था, जो रूस से तेल और गैस खरीदना जारी रखते हैं। इस फैसले से भारत के सामने बड़ी चुनौती खड़ी हो गई थी। भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का 88 प्रतिशत से अधिक हिस्सा आयात करता है। अगस्त में भारत के कुल कच्चे तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी 45 प्रतिशत थी।
उस महीने भारत रूस से रोजाना 20.8 लाख बैरल कच्चा तेल खरीद रहा था। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने शुक्रवार को कहा कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए व्यापक स्तर पर जो रणनीति अपनाता है, वह बाजार में तेल की उपलब्धता और दुनिया में उस समय की परिस्थितियों पर निर्भर करती है। उन्होंने विदेश मंत्रालय की साप्ताहिक प्रेस वार्ता के दौरान यह बात कही। इससे पहले भी भारतीय विदेश मंत्रालय कह चुका था कि इस कानून से भारत-अमेरिका के द्विपक्षीय संबंधों और दुनिया के ऊर्जा बाजार पर पड़ने वाले संभावित असर के बारे में भारतीय पक्ष ने अमेरिकी अधिकारियों के साथ बातचीत में अपनी बात बिल्कुल स्पष्ट रूप से रखी है। हालांकि, विश्लेषकों का मानना है कि पश्चिम एशिया में ऊर्जा संकट को देखते हुए अमेरिका रूस पर प्रतिबंध लगाने के मामले में फिलहाल सख्ती से बच सकता है। इसकी वजह यह है कि रूस से तेल की आपूर्ति और कम करने पर दुनिया भर में तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं। वहीं, होर्मुज जलमार्ग में आपूर्ति बाधित होने के कारण रूस का कच्चा तेल ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से बेहद अहम हो गया है।
