शिमला: ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज मंत्री अनिरुद्ध सिंह ने आज यहां एक प्रेस वार्ता को संबोधित करते हुए कहा कि केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित विकसित भारत-रोजगार एवं आजीविका गारंटी मिशन (ग्रामीण) अधिनियम, 2025 महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) की मूल भावना के विपरीत है। यह अधिनियम राज्यों पर अतिरिक्त वित्तीय एवं प्रशासनिक बोझ डालने के साथ-साथ उनकी वित्तीय स्वायत्तता को भी प्रभावित करेगा। इस कानून को तैयार करने से पहले राज्यों से वित्तीय दायित्व, मजदूरी दर, कार्यों की प्रकृति तथा रोजगार की मांग जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर कोई व्यापक परामर्श नहीं किया गया।
मनरेगा एक मांग आधारित योजना थी, जिसमें ग्रामीण क्षेत्रों में वास्तविक मांग के अनुरूप रोजगार उपलब्ध कराया जाता था तथा केंद्र और राज्य सरकारें अपनी-अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करती थीं। वहीं प्रस्तावित विकसित भारत-रोजगार एवं आजीविका गारंटी मिशन (ग्रामीण) अधिनियम, 2025 के तहत केंद्र सरकार वार्षिक मानक बजट आवंटन तक ही अपनी वित्तीय जिम्मेदारी सीमित करना चाहती है, जिससे अतिरिक्त वित्तीय बोझ सीधे राज्यों पर आएगा।
ग्रामीण विकास मंत्री ने कहा कि वर्तमान में केन्द्र सरकार द्वारा गैर जनजातीय क्षेत्रों के लिए 247 रुपये प्रतिदिन की मजदूरी निर्धारित की गई है। प्रस्तावित विकसित भारत-रोजगार एवं आजीविका गारंटी मिशन (ग्रामीण) अधिनियम, 2025 के तहत अब तक केन्द्र सरकार द्वारा मजदूरी दरों में किसी भी प्रकार की वृद्धि की अधिसूचना जारी नहीं की गई है। ऐसे में श्रमिकों के हित प्रभावित होने की संभावना है तथा राज्य सरकार पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ भी बना रहेगा।
वर्तमान व्यवस्था में मजदूरी का 100 प्रतिशत व्यय केंद्र सरकार द्वारा वहन किया जाता है, जबकि प्रस्तावित अधिनियम के तहत मजदूरी व्यय में राज्य सरकारों को भी 10 प्रतिशत की हिस्सेदारी देनी होगी। इसके अतिरिक्त प्रशासनिक व्यय, कर्मचारियों के वेतन तथा अन्य संचालन संबंधी खर्चों में भी राज्यों का योगदान बढ़ाया गया है, जिससे राज्यों की वित्तीय जिम्मेदारी पहले की तुलना में कहीं अधिक हो जाएगी।
हिमाचल प्रदेश जैसे पर्वतीय राज्यों की विशेष भौगोलिक परिस्थितियों, प्राकृतिक आपदाओं की संवेदनशीलता, निर्माण कार्यों की अधिक लागत, बिखरी हुई ग्रामीण आबादी तथा सीमित रोजगार अवसरों को नए आवंटन फार्मूले में पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया है। यदि वास्तविक मांग केंद्र द्वारा निर्धारित नार्मेटिव आवंटन से अधिक होती है तो अतिरिक्त व्यय का पूरा भार राज्य सरकार को वहन करना पड़ेगा, जिससे ग्रामीण रोजगार योजना के प्रभावी संचालन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
नए अधिनियम में ग्राम पंचायतों पर विकास योजनाओं के विस्तृत निर्माण, जीआईएस आधारित योजना प्रणाली, पीएम गति शक्ति एवं विकसित ग्राम पंचायत योजनाओं के एकीकरण, बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण, जीपीएस आधारित निगरानी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित योजना निर्माण तथा डिजिटल अनुपालन जैसी नई जिम्मेदारियां भी डाली गई हैं। इससे प्रशासनिक जटिलताएं बढ़ेंगी तथा विशेष रूप से हिमाचल जैसे दुर्गम राज्यों में योजना के क्रियान्वयन में अतिरिक्त चुनौतियां उत्पन्न होंगी।
वर्तमान रोजगार स्तर के आधार पर हिमाचल प्रदेश की अनुमानित वित्तीय देनदारी 164.63 करोड़ रुपये हो जाएगी। यदि केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित वार्षिक आवंटन वास्तविक मांग से कम रहा तो अतिरिक्त व्यय पूरी तरह राज्य सरकार को उठाना पड़ेगा, जिससे प्रदेश पर हर वर्ष भारी वित्तीय बोझ पड़ने की आशंका है।
अनिरूद्ध सिंह ने कहा कि आरडीजी बंद किए जाने से हिमाचल प्रदेश को भारी आर्थिक नुकसान हुआ है। उन्होंने कहा कि जब हिमाचल प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार सत्ता में थी, तब केन्द्र सरकार द्वारा प्रदेश को लगभग 47,000 करोड़ रुपये आरडीजी प्राप्त हुई थी, जबकि वर्तमान राज्य सरकार के कार्यकाल में अब तक केवल लगभग 11,000 करोड़ रुपये आरडीजी प्राप्त हुई। केंद्र सरकार द्वारा वर्ष 2026 में आरडीजी बंद कर दी जाएगी जिसके कारण प्रदेश सरकार पर 800 करोड़ से 1,000 करोड़ तक का वार्षिक अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ेगा। उन्होंने कहा कि यह अंतर केंद्र सरकार के भेदभावपूर्ण रवैये को स्पष्ट रूप से दर्शाता है। प्रदेश सरकार हिमाचल के हितों की रक्षा के लिए इस मुद्दे को लगातार मजबूती से उठाती रहेगी और राज्य के अधिकारों से किसी भी प्रकार का समझौता नहीं किया जाएगा।

