धर्म: दुनिया के सबसे अमीर मंदिरों की यदि बात करें तो उसमें तिरुपति बालाजी पहले स्थान पर आता है। इस मंदिर में मिलने वाले श्रीवारी लड्डू प्रसाद को आज 311 साल पूरे हो गए हैं। इतनी साल बीतने के बाद भी लड्डू का स्वाद वैसे का वैसे ही बना हुआ है। पहले इस लड्डू को लकड़ी की आग पर बनाया जाता था परंतु अब एआई आधारित मशीनें इस श्रीवारी लड्डू में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल में मिलावट की जांच कर रही है।
पहली बार 2 अगस्त 1715 को बनाया गया था लड्डू
यह लड्डू 2 अगस्त 1715 को पहली बार पुराने पोटू में मोटी बूंदी का पहला लड्डू बनाकर भगवान का नैवेद्द के तौर पर अर्पित किया गया था। उस समय करीबन 21 दिन की तैयारी और योजना के बाद इस लड्डू को बनाया गया था। मंदिर को प्रबंधन संभालने वाले तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी ने यह बताया कि अभी मंदिर में हर दिन 4.08 लाख लड्डू बनाए जाते हैं। ब्रह्मोत्सव और बाकी पर्वों की संख्या बढ़कर 8 से 10 लाख हो जाती है। इस खास लड्डू के लिए रविवार का दिन खास महत्व रखता है।
दिनभर में 20 घंटे बनता है लड्डू
पोटू में करीबन 250 से 270 मुख्य और कुशल रसोइए हैं। इन्हें पारंपरिक रुप से पारीचारक कहा जाता है। ये मुख्य रुप से सामग्री, मिलाने, बूंदी तलने और शुद्धता बनाए रखने का काम करते हैं। इसके अलावा 350 से 400 कर्मचारी सामग्री ले जाने, बूंदी छानने, लड्डुओं को हाथ से आकार देने और कन्वेयर बेल्ट पर रखने का काम करते है। लड्डू बनाते समय वैष्णव ब्राह्माण लगातार ऊं नमो वेंकेटेशाय का जाप करते हैं या विष्णु सहस्नाम और पवित्र वैदिक सूत्कों का पाठ करते हैं। दिनभर में 20 घंटे लड्डू बनाए जाते हैं। इसके लिए तीन अलग-अलग टीमें भी काम करती हैं।
चूल्हे पर बेसन गर्म करके लड्डू किए जाएंगे तैयार
आंध्र प्रदेश में स्थित तिरुपति मंदिर परिसर के 2,000 वर्ग फीट के पोटू में मौजूद हैं। जहां बना लड्डू पहली बार भगवान को भोग के तौर पर चढ़ाया गया था। यहां आज भी चूल्हे पर बेसन गर्म करके लड्डू तैयार किए जाते हैं। इसके अलावा मंदिर में 25 वैष्णव ब्राह्माण भगवान के लिए खास प्रसाद बना रहे हैं।
