धर्म: जन्माष्टमी के कुछ दिनों बाद हर साल राधा अष्टमी मनाई जाती है। राधा अष्टमी भाद्रपद महीने की शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि वाले दिन मनाई जाती है। राधा रानी को श्रीकृष्ण की अर्धांगिनी के तौर पर माना जाता है। ऐसे में यह दिन राधा रानी के प्राकट्यू दिवस के रुप में खास महत्व रखता है। राधा अष्टमी के व्रत और पूजा की परपंरा को बृहन्नारदीय पुराण के साथ भी जोड़ा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन पूरी श्रद्धा के साथ व्रत रखने और मध्याह्न काल में राधा रानी की पूजा करने से खास पुण्य मिलता है। राधा रानी की कृपा मिलती है। राधा के बिना कान्हा की पूजा अधूरी मानी जाती है।
19 सितंबर को मनाई जाएगी राधा अष्टमी
इस साल राधा अष्टमी 19 सितंबर को मनाई जाएगी। पंचागों की मानें तो अष्टमी तिथि की शुरुआत दोपहर 1 बजे होगी और इसका समापन दोपहर में 3:26 पर होगा। इस दिन पूजा के लिए मध्यान्नह काल का खास महत्व होता है। इस अवधि में श्रद्धालु राधा रानी और श्रीकृष्ण की विधि विधान के साथ पूजा करते हैं। राधा अष्टमी पर पूजा के लिए सुबह 11:01 बजे से लेकर दोपहर 1:38 बजे तक रहेगा।
ऐसे करें राधारानी की पूजा
राधा अष्टमी वाले दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें। इसके बाद साफ कपड़े पहनें। फिर पूजा स्थान को साफ करें और राधा-रानी और श्रीकृष्ण की प्रतिमा या तस्वीर रखें। इसके बाद सबसे पहले श्रीगणेश का ध्यान करें और इसके बाद राधा-कृष्ण का स्मरण करें। राधा रानी को फूल, मिठाई और अपनी श्रद्धा के अनुसार भोग लगाएं। पूजा में धूप और दीप जरुर जलाएं। इसके बाद राधा-कृष्ण के मंत्रों का जाप, भजन और कीर्तन करें। परंपरा के अनुसार, राधा रानी की षोडशोपचार पूजा का भी खास विधान माना जाता है।
गुप्त दान का होता है खास महत्व
इस दिन गुप्त दाना करना भी शुभ माना जाता है। धार्मिक परंपराओं में भी गुप्त दान का खास महत्व बताया गया है। ऐसा बोला जाता है कि ऐसे दान को करने के दौरान प्रदर्शन नहीं करना चाहिए। उड़द की दाल, काले कपड़े या लोहे से बनी हुई वस्तुओं का दान करने की परंपरा भी इस दिन बताई जाती है। मान्यताओं के अनुसार इन चीजों को दान करने से विवाह संबंधी परेशानियां दूर होती है।