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करोड़ों की लागत के 3600 से अधिक खैर व सफेदा पेड़ों की अवैध कटाई पर उठे सवाल, देखें वीडियो

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चंडीगढ़ः चंडीगढ़ आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में पर्यावरणविद् शीशपाल और अधिवक्ता संजीव चौधरी ने पंचकूला जिले के मुवास, असरेवाली तथा एचएमटी पिंजौर क्षेत्र में हजारों पेड़ों की कथित अवैध कटाई का मामला उठाते हुए वन विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए। उन्होंने पूरे प्रकरण की किसी स्वतंत्र एजेंसी से निष्पक्ष जांच कराने तथा जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की सरकार से मांग की।

प्रेस वार्ता में बताया गया कि मुवास गांव के निकट पंजाब भूमि संरक्षण अधिनियम (PLPA), 1900 की धारा-4 के तहत संरक्षित क्षेत्र में मार्च 2025 के दौरान लगभग 2,000 सफेदा पेड़ों की अवैध कटाई सामने आई थी। 21 मार्च 2025 को संरक्षक वन, अंबाला द्वारा किए गए निरीक्षण में यह पाया गया कि लगभग 4,000 नियोजित पेड़ों में से करीब 2,000 पेड़ काट दिए गए थे। आरोप है कि उस समय संबंधित अधिकारियों को इस बारे में जानकारी होने के बावजूद प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई।

इसके बाद फरवरी-मार्च 2026 में असरेवाली क्षेत्र के संरक्षित वन क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर बहुमूल्य खैर वृक्षों की कटाई का मामला सामने आया। विभागीय जांच में 1,138 खैर वृक्षों की अवैध कटाई की पुष्टि हुई। वहीं मार्च 2026 में पिंजौर स्थित एचएमटी परिसर में भी 1,456 खैर वृक्षों की कटाई का मामला उजागर हुआ। इन तीनों मामलों में कुल 4,594 पेड़ों की कटाई रिपोर्ट होने का दावा किया गया।

शीशपाल और संजीव चौधरी ने आरोप लगाया कि असरेवाली प्रकरण में तत्कालीन डीएफओ मोरनी-पिंजौर विशाल कौशिक, आरएफओ मुनीर गुप्ता तथा अन्य अधिकारियों को 20 मार्च 2026 को निलंबित किया गया था, लेकिन एक माह के भीतर उन्हें पुनः उसी क्षेत्र में तैनात कर दिया गया। उनका कहना था कि जिन अधिकारियों के खिलाफ जांच चल रही हो, उन्हें उसी पद पर बहाल करना जांच की निष्पक्षता को प्रभावित कर सकता है क्योंकि आवश्यक अभिलेख और विभागीय नियंत्रण उनके पास ही रहता है।

उन्होंने सवाल उठाया कि जब प्रधान मुख्य वन संरक्षक और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों को अभी तक उनके पदभार से वंचित रखा गया है, तब निलंबित अधिकारियों की इतनी शीघ्र पुनर्नियुक्ति किस आधार पर की गई। उन्होंने इसे चयनात्मक कार्रवाई बताते हुए कहा कि इससे गलत संदेश जाता है और जांच की विश्वसनीयता प्रभावित होती है।

प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया गया कि मामला राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) में विचाराधीन है। आईए संख्या 261/2026 के तहत महिमा दत्त को मामले में पक्षकार बनाए जाने की अनुमति दी गई है। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से यह आपत्ति भी उठाई गई कि जिन अधिकारी पर मुख्य आरोप हैं, उन्हीं की ओर से अन्य प्रतिवादियों का जवाब भी दाखिल किया गया है। इस पर अधिकरण ने सही तथ्यात्मक स्थिति स्पष्ट करने के लिए प्रतिवादी संख्या-1 को अगली सुनवाई पर उपस्थित होकर सहायता करने का निर्देश दिया है।

पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि हरियाणा में वन क्षेत्र पहले ही कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का लगभग 3.65 प्रतिशत है। ऐसे में हजारों पेड़ों की कथित अवैध कटाई केवल पर्यावरण ही नहीं बल्कि वन्यजीव आवास, भूजल संरक्षण और पारिस्थितिकी तंत्र के लिए भी गंभीर खतरा है। उन्होंने मांग की कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषियों को जवाबदेह बनाया जाए तथा भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाए जाएं। उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे अफसर सरकार की छवि को धूमिल करते हैं।

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