अमृतसरः भाई बलवंत सिंह राजोआना ने जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गड़गज को भावुक पत्र लिखा है। जिसमें उन्होंने पंथक मुद्दों पर खुलकर रखी अपनी राय रखी। जिसमें कहा गया कि ‘सिख समुदाय की एकता और पंथिक मर्यादा सबसे बड़ी प्राथमिकता है।’ जेल से लिखे एक पत्र में, राजोआना ने पंथ के बुलंद हौसलों का आह्वान किया और जत्थेदार से एक अनुरोध किया। पत्र में भाई राजोआना ने यह भी मांग की कि कुछ बीजेपी नेताओं को तलब किया जाए और उनसे जवाब मांगा जाए।
राजोआना ने लिखा कि उसे जेल में 31 साल और फांसी की चक्की में 31 जुलाई को 19 साल पूरे हो जाएंगे। यह सारा वाक्या बेइंसाफी के इतिहास का वह पन्ना है, जिसे जब भी कोई सच्चा इंसान लिखेंगा तो हमारी आने वाली पीढ़ियों को भी इसके बारे में पता चल पाएगा। आगे पत्र में श्री अकाल तख्त साहिब के जत्थेदार गड़गज्ज को कहाकि श्री अकाल तख्त साहिब का प्रत्येक आदेश मेरे लिए इलाही हुकम की तरह है। इसे मानने के लिए मैं प्रतिबंध हूं। उन्होंने कहा कि 1984 में मैं 11वीं कक्षा में पढ़ता था।
उस समय दिल्ली के तख्त पर बैठे कांग्रेसी आदेशों पर टैंको और तोपों के साथ ढेरी किए गए श्री अकाल तख्त साहिब के सामने खड़े होकर ऐसे जुल्म करने वाले आदेशों से बदला लेने के लिए श्री गुरु गोबिंद सिंह पातशाह के चरणों में मैंने अरदास की। जिसके बाद मेरा जीवन संघर्ष और श्री गुरु गोबिंद सिंह साहिब के चरणों को समर्पित हो गया। इस दौरान हिंदोस्तान की अदालत ने मुझे मौत की सजा सुनाई, जिसे मैंने हंसकर स्वीकार किया। आगे लिखा कि 31 मार्च 2012 को चंडीगढ़ की सेशन कोर्ट में उन्हें फांसी देने के लिए डेथ वारंट भी जारी कर दिए गए थे। उस समय मैंने अपना संघर्ष श्री अकाल तख्त साहिब को समर्पित कर दिया था और इस फैंसले को हंसकर स्वीकार कर लिया था।
उन्होंने पत्र में बीजेपी के प्रमुख सिख नेताओं को श्री अकाल तख्त साहिब पर तलब कर यह पूछने की मांग भी की कि 6 महीने में होने वाला फैसला 15 साल बाद भी क्यों नहीं हुआ। साथ ही 2019 में जारी नोटिफिकेशन को अब तक लागू न किए जाने और पांच सदस्यीय कमेटी को मिलने का समय न देने पर भी सवाल उठाए। बलवंत सिंह राजोआणा ने कहा कि वह इस मामले में ठोस और जल्द फैसला चाहते हैं, ताकि उनकी चिट्ठियों का भी सुप्रीम कोर्ट में पड़ी 41 तारीखों की तरह इतिहास न बन जाए।
