नई दिल्ली: हर साल 18 जुलाई को पूरी दुनिया में इंटरनेशनल नेल्सन मंडेला डे मनाया जाता है। यह दिन सिर्फ दक्षिण अफ्रीका के पूर्व राष्ट्रपति और महान समाजसेवी नेल्सन मंडेला का याद करने के लिए नहीं बल्कि उनके जीवन से मोटिवेशन लेने का भी अवसर होता है। नेल्डन मंडेला ने अपना पूरा जीवन समानता, न्याय, शांति और मानवता की सेवा के लिए समर्पित किया। यही कारण है कि इस दिन दुनिया भर के लोगों से यह अपील की जाती है कि वो कम से कम 67 मिनट समाज सेवा के लिए जरुर दें। दूसरों की मदद करें। समाज के लिए कुछ अच्छा करें। इंटरनेशनल नेल्सन मंडेला डे का संदेश यही है कि यदि हर व्यक्ति थोड़ा सा समय भी दूसरों की मदद के लिए निकालें तो समाज में बड़ा बदलाव लाया जा सकता है।
67 मिनट सेवा होती है खास
नेल्सन मंडेला डे पर 67 मिनट सेवा पर सबसे खास मानी जाती है। यह नेल्सन मंडेला के समाज और मानवता के लिए किए गए 67 के साल योगदान का प्रतीक है। उन्होंने अपना जीवन समानता, न्याय, मानवाधिकार और लोगों की भलाई के लिए समर्पित कर दिया था। उनके इसी योगदान को सम्मान देने के लिए 2009 में 67 Minutes Of Service अभियान शुरु किया गया है। इसके अंतर्गत लोगों से अपील की जाती है कि वो 18 जुलाई को अपने दिन के कम से कम 67 मिनट किसी अच्छे काम जैसे जरुरतमंदों की मदद करने, सफाई अभियान में हि्ससा लेने,. पेड़ लगाने, बच्चों को पढ़ाने या किसी सामाजिक सेवा में लगाएं। इसका मुख्य उद्देश्य लोगों को यह समझाना है कि थोड़ी सी कोशिश भी समाज में बड़ा और पॉजिटिव बदलाव ला सकती है।
आखिर क्यों मनाया जाता है इंटरनेशनल नेल्सन मंडेला डे?
संयुक्त राष्ट्र महासभा ने नवंबर 2009 में 18 जुलाई को आधिकारिक तौर पर इंटरनेशनल नेल्सन मंडेला डे घोषित किया था। पहला आधिकारिक आयोजन 18 जुलाई 2010 को मंडेला के 92वें जन्मदिन पर किया गया है। इस दिन का उद्देश्य लोगों का यह याद दिलाना है कि हर व्यक्ति समाज में पॉजिटिव बदलाव लाने की क्षमता रखता है।
आखिर कौन थे नेल्सन मंडेला?
नेल्सन मंडेला का जन्म 18 जुलाई 1918 को दक्षिण अफ्रीका के म्वेजो गांव में हुआ था। वो 1994 से 1999 तक दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति रहे हैं और देश के पहले अश्वेत राष्ट्रपति बने थे। उन्होंने रंगभेद के खिलाफ लंबा संघर्ष किया और अश्वेत लोगों को बराबरी का अधिका दिलवाने के लिए पूरी जिंदगी काम किया है। इस संघर्ष के दौरान उन्होंने करीबन 27 साल तक जेल में भी बिताए थे परंतु अपने सिद्धांतों से वह पीछे नहीं हटे। साल 1993 में उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।
