धर्म: पूरी के जगन्नाथ मंदिर में होने वली रथ यात्रा का भक्तों को पूरे साल इंतजार रहता है। यह सिर्फ एक धार्मिक त्योहार नहीं बल्कि आस्था परंपरा और भक्ति का अद्भूत मिलन है। हर साल लाखों भक्त जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के दर्शन के लिए पुरी पहुंचते हैं लेकिन रथ यात्रा से ठीक पहले भगवान जगन्नाथ 15 दिनों के लिए बीमार पड़ जाते हैं। इस दौरान भक्त उनके दर्शन नहीं कर पाते हैं।
स्नान पूर्णिमा के बाद आखिर कब शुरु होगा अनसर काल
रथ यात्रा से पहले ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन स्नान पूर्णिमा का आयोजन होता है। इस मौके पर भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा को 108 पवित्र घड़ों के जल से विशेष स्नान कराया जाता है। धार्मिक मान्याओं के अनुसार, इतने भव्य स्नान के बाद भगवान को बुखार आ जाता है और वे अस्वस्थ हो जाते हैं। इसी कारण भगवान 15 दिनों तक विश्राम करते हैं। इस अवधि को अनसर काल या अनवसर काल कहते हैं। इस दौरान मंदिर के गर्भगृह के कपाट आम भक्तों के लिए बंद रहते हैं और भगवान का विशेष तौर पर उपचार किया जाता है।
भगवान जगन्नाथ का पिघल गया था दिल
पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान जगन्नाथ के परम भक्त माधव दास काफी समय से एक गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे। उन्होंने अपने आराध्य का कष्ट दूर करने के लिए प्रार्थना भी की। इसके उत्तर में भगवान ने बताया कि उनके पिछले जन्म के कर्मों के कारण अभी 15 दिनों की बीमारी और शेष है। इसके बाद ही उन्हें मुक्ति मिलेगी। अपने भक्त का कष्ट देखकर भगवान जगन्नाथ का हृदय पिघल गया है। माना जाता है कि उन्होंने माधव दास की बीमारी के वो आखिरी 15 दिन खुद अपने ऊपर ले लिए। परिणामस्वरुप माधव दास स्वस्थ हो गए और खुद भगवान अस्वस्थ हो गए। तब से यह परंपरा चली आ रही है कि स्नान पूर्णिमा के बाद भगवान जगन्नाथ 15 दिनों तक बीमार रहते हैं।
कई तरह की औषधियों से किया जाता है भगवान का उपचार
अनसर काल के दौरान भगवान को सामान्य भोग अर्पित नहीं करते हैं। उनकी सेवा वैद्य परंपरा के अनुसार, ही की जाती है। भगवान को जल्द स्वस्थ करने के लिए उन्हें काढ़े, औषधियों और जड़ी-बूटियों से तैयार विशेष भोग अर्पित किए जाते हैं।
जब भगवान पूरी तरह स्वस्थ हो जाते हैं तो भक्त नवयौवन दर्शन के जरिए से उनके दर्शन कर पाते हैं। इसके बाद भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ भव्य रथ यात्रा पर निकलते हैं। भगवान जगन्नाथ के बीमार होने की यह कथा सिर्फ एक धार्मिक मान्यता नहीं है बल्कि भगवान और भक्त के बीच में अटूट प्रेम का प्रतीक है। यह कहानी यह दर्शाती है कि सच्ची भक्ति के सामने भगवान खुद अपने भक्तों के कष्टों को सहने के लिए तैयार रहते हैं। यही कारण है कि जगन्नाथ रथ यात्रा करोड़ों भक्तों की भावनाओं और विश्वास एक महामिलन बन गई है।

