जालंधर, ENS: श्री सिद्ध बाबा सोढल मंदिर लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। यहां पर अनंत चौदस पर बहुत बड़ा मेला लगता है, जो कई दिन तक चहल-पहल का केंद्रबिंदू बना रहता है। इस मेले में देश-विदेश से श्रद्धालु आते है और मन्नतें मांगते है। वहीं इस बार भी मेले का आगाज हो गया है और शहर में मेले को लेकर झूले लग गए और दुकानें भी सज गए है। भारी संख्यां में श्रद्धालु माथा टेकने के लिए एक दिन पहले ही आने लग गए है। पुलिस द्वारा सुरक्षा के पुख्ता किए गए है। ऐसे में 1500 पुलिस मुलाजिम तैनात किए है और ड्रोन के जरिए शरारती अनंसरों पर पैनी नजर रखी जा रही है। मेले से एक दिन पहले ही हवन से इसकी शुरुआत हो जाती है। आनंद-चड्ढा परिवारों की ओर से बरसों पहले शुरू की गई मेले की रीत अब सभी कौम की आस्था में बदल गया है।
ऐसे में यह मेला एक परिवार का न रहकर सभी का बन गया है। मान्यता के अनुसार, चड्ढा और आनंद परिवार के सदस्य एक दिन पहले ही इकट्ठे हो जाते हैं। मान्यता है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई मुराद पूरी होती है। मन्नत पूरी होने के बाद श्रद्धालु बाबा को रोट या अपनी श्रद्धा के अनुसार प्रसाद अर्पित करते हैं। स्थानीय मान्यता के अनुसार, बाबा सोढल को चढ़ाया गया प्रसाद घर की बेटी ग्रहण कर सकती है, जबकि उसके पति और बच्चों को यह प्रसाद देने की परंपरा नहीं है। यह एक धार्मिक और स्थानीय परंपरा है, जिसका पालन श्रद्धालु अपनी आस्था के अनुसार करते हैं।साल 2026 में श्री सिद्ध बाबा सोढल मेला 25 सितंबर, शुक्रवार को आयोजित होगा। श्री सिद्ध बाबा सोढल मंदिर का इतिहास करीब 300 साल पुराना बताया जाता है।
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, जिस स्थान पर आज मंदिर है, वहां कभी घना जंगल हुआ करता था। इसी जगह एक छोटा-सा तालाब भी था और उसके पास एक संत कुटिया बनाकर रहते थे। कहा जाता है कि चड्ढा बिरादरी की एक महिला संतान प्राप्ति की इच्छा लेकर संत के पास पहुंची। लोककथा के अनुसार, संत ने उसे आशीर्वाद दिया और कहा कि उसके घर ऐसा बालक जन्म लेगा, जो आगे चलकर लोगों की सेवा करेगा। इसके बाद उसके घर एक पुत्र का जन्म हुआ, जिसका नाम सोढल रखा गया। बाबा सोढल से जुड़ी लोककथा में तालाब का विशेष महत्व बताया जाता है। मान्यता के अनुसार, एक दिन बाबा सोढल की माता तालाब के पास कपड़े धो रही थीं और बालक सोढल वहां खेल रहे थे। उनकी शरारतों से परेशान होकर माता ने उन्हें तालाब में चले जाने के लिए कह दिया। कहा जाता है कि उस समय बाबा सोढल की उम्र करीब चार वर्ष थी। माता की बात मानकर वह तालाब में कूद गए।
जब काफी देर तक वह वापस नहीं आए तो उनकी माता विलाप करने लगीं। लोकविश्वास के अनुसार, इसी दौरान बाबा सोढल शेषनाग के रूप में प्रकट हुए। मान्यता है कि शेषनाग रूप में प्रकट हुए बाबा सोढल ने श्रद्धालुओं को आशीर्वाद दिया और कहा कि जो भी व्यक्ति यहां अपनी मनोकामना लेकर आएगा, उसकी मुराद पूरी होगी। इसके बाद वह फिर तालाब में समा गए। स्थानीय धार्मिक मान्यता के अनुसार, इसी घटना के बाद से यहां श्रद्धालुओं के आने और मेला लगने का सिलसिला शुरू हुआ। आज भी बड़ी संख्या में लोग बाबा सोढल के दरबार में अपनी मनोकामना लेकर पहुंचते हैं। मंदिर परिसर में तालाब के चारों ओर बनी सीढ़ियों और गोलाकार चबूतरे को भी शेषनाग के स्वरूप से जोड़कर देखा जाता है।