नई दिल्ली: आईटी सेक्टर की बड़ी कंपनी कॉन्गिजेंट एक बार फिर अपने वर्कफोर्स में बड़ी कटौती की तैयारी कर रही है। हैरान करने वाली बात यह है कि एक तरफ कंपनी की बात कर रही है तो दूसरी तरफ इसी साल 20,000 फ्रेशर्स (नए छात्र) को भर्ती करने का प्लान भी है।
आखिर क्यों हो रही है छंटनी?
कॉग्निजेंट में बदलाव की यह बयार आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और लागत घटाने की कोशिशों से जुड़ी है। कंपनी खुद को भविष्य के लिए तैयार कर रही है जहां ऑटोमेशन को बोलबाला होगा। मिंट की रिपोर्ट के अनुसार, यह कटौती कंपनी के ग्लोबल वर्कफोर्स का लगभग 1 प्रतिशत हो सकती है।
आखिर क्या है प्रोजेक्ट लीप
कंपनी के अंदर प्रोजेक्ट लीप नाम का एक प्रोग्राम चल रहा है। इसका मकसद डिजिटल सेवाओं पर एआई आधारित कामों को मजबूत करना है। कंपनी इस प्रोजेक्ट पर करोड़ों डॉलर खर्च कर रही है लेकिन साथ ही साल के अंत तक करोड़ों की बचत का भी लक्ष्य रखा हुआ है।
जानकारों का यह कहना है कि अब बड़ी टीमों के जगह ऑटोमेटेड सिस्टम और एआई पर भरोसा बढ़ाया जा रहा है। यही कारण है कि कंपनी अब पुराने रोल्स को कम करके एंट्री लेवल पर नई प्रतिभाओं को तरजीह दे रही है।
मार्च 2026 तक कॉग्निजेंट में कुल कर्मचारियों की संख्या 3,57,600 थी। यह नेतृत्व में छंटनी का दूसरा बड़ा दौर हो सकता है। इससे पहले भी करीबन 3500 पदों का खत्म किया गया था जिसका असर ज्यादातर उन लोगों पर पड़ा था। सीधे तौर पर प्रोजेक्ट्स का हिस्सा नहीं थे।
सिर्फ तकनीक ही नहीं खर्चों पर भी लगाम
एवरेस्ट ग्रुप के एक्सपर्ट पीटर बेंडर सैमुअल का मानना है कि कंपनियां सिर्फ तकनीक की कारण से नहीं बल्कि खर्च बचाने के लिए भी ऐसे कदम उठा रही है। यात्रा जैसे अतिरिक्त खर्चों में कटौती की जा रही है और एआई से होने वाले बदलावों के बीच खुद को ढालने की कोशिश हो रही है।
