अमृतसरः पंजाबी सूबा मोर्चा के दौरान 4 जुलाई, 1955 को श्री दरबार साहिब पर पुलिस हमले की याद में शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) ने गुरुद्वारा श्री मंजी साहिब दीवान हॉल में धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किया। इस मौके पर श्री अखंड पाठ साहिब का भोग डाला गया, शबद कीर्तन गाया और बड़ी संख्या में SGPC सदस्य, धार्मिक हस्तियां और संगत मौजूद थी।
इस मौके पर पत्रकारों से बात करते सचखंड श्री दरबार साहिब के ग्रंथी और विद्वान ज्ञानी राजदीप सिंह ने कहा कि 4 जुलाई 1955 सिख इतिहास का एक दुखद और अहम दिन है। उन्होंने कहा कि उस समय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की लीडरशिप वाली केंद्र सरकार ने पंजाबी सूबा की मांग को दबाने के लिए सचखंड श्री हरमंदिर साहिब और मंजी साहिब दीवान हॉल पर हमला किया था। उन्होंने कहा कि देश के बंटवारे के बाद जब भाषा के आधार पर अलग-अलग राज्य बनाए जा रहे थे, तब सिखों ने भी पंजाबी भाषा के आधार पर पंजाबी सूबा की मांग की थी। लेकिन उस समय इस जायज मांग को मानने के बजाय सिखों को आतंकवादी, अलगाववादी और बागी कहकर बदनाम किया गया।
ज्ञानी राजदीप सिंह ने कहा कि 1954 में जब पंजाबी सूबा मोर्चा शुरू हुआ, जब उसे लोगों का भारी सपोर्ट मिलने लगा, तो सरकार ने उसे कुचलने के लिए श्री हरमंदिर साहिब पर कार्रवाई की और उस समय के मुख्य ग्रंथी ज्ञानी भूपिंदर सिंह और श्री अकाल तख्त साहिब के जत्थेदार ज्ञानी अच्छर सिंह को भी गिरफ्तार कर लिया गया। उन्होंने कहा कि सरकार की सख्त कार्रवाई के बावजूद यह आंदोलन नहीं रुका और आखिरकार 1966 में पंजाबी सूबा बना। हालांकि, उन्होंने कहा कि उस समय पंजाब को पूरे अधिकार नहीं मिले थे और कई पंजाबी बोलने वाले इलाके दूसरे राज्यों में शामिल कर लिए गए थे। उन्होंने कहा कि SGPC हर साल यह ऐतिहासिक दिन मनाती है ताकि सिख समुदाय अपने इतिहास, बलिदान और संघर्ष को याद रख सके। उन्होंने संगत को गुरु साहिब से जुड़ने, अमृत लेने और बाणी-बाणा के वाहक बनने का भी न्योता दिया।


