चंडीगढ़: भगवंत मान सरकार ‘स्कूल नशों विरुद्ध’ पाठ्यक्रम के माध्यम से युवाओं में नशे के सेवन को रोकने के लिए ऐसी धारणाओं को तोड़ने और दूर करने का प्रयास कर रही है। सीईजीए, यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, बर्कले और नोबेल पुरस्कार विजेता अभिजीत बनर्जी तथा एस्थर डुफ्लो द्वारा सह-स्थापित शोध संस्था जे-पाल के सहयोग से विकसित यह साक्ष्य-आधारित पाठ्यक्रम युवाओं में नशीले पदार्थों, विशेष रूप से ओपिओइड्स की लत के जोखिम को कम करके आंकने की प्रवृत्ति पर ध्यान केंद्रित करता है।
पाठ्यक्रम में युवाओं के बीच नशों से संबंधित कई प्रमुख गलत धारणाओं की पहचान की गई है, जिनका समाधान करना जरूरी है। पहली और शायद सबसे खतरनाक गलत धारणा यह है कि चिट्टा या हेरोइन को एक या कुछ बार आजमाने से लत नहीं लगती। वास्तविकता यह है कि हेरोइन अत्यधिक नशीला पदार्थ है और इसकी एक बार की भी उपयोग से लत लगने का जोखिम हो सकता है।
पांचवीं गलत धारणा शायद इतनी स्पष्ट नहीं है: यह कि जो व्यक्ति अंततः नशे की लत का शिकार हो जाता है, उसने शुरुआत से ही नियमित रूप से नशा करने का इरादा बनाया होगा। अभियान इस बात पर जोर देता है कि नशे की शुरुआत अस्थायी प्रयोग से भी हो सकती है। इसके पीछे साथियों का दबाव, निजी संकट, मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियां या प्रदर्शन का दबाव जैसे कई कारण हो सकते हैं।
पंजाब के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री डॉ. बलबीर सिंह ने कहा, “मूल रूप से, ‘युद्ध नशों के विरुद्ध’ अभियान नशों के दुरुपयोग के बारे में होने वाली बातचीत की दिशा बदलने का प्रयास कर रहा है—ऐसी बातचीत से, जो नशे की लत लग जाने के बाद शुरू होती है, ऐसी बातचीत की ओर, जो उस समय शुरू हो जब कोई युवा पहली बार यह सुनता है: ‘एक बार आजमाकर देखो, कुछ नहीं होगा।’