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Punjab News: जमीन विवाद पर बाबा निहाल सिंह और SGPC अध्यक्ष का आया बयान, देखें वीडियो

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अमृतसरः मिसल शहीदा तरना दल हरियां वेलां से जुड़े जमीनी विवाद पर सोशल मीडिया पर चल रही चर्चाओं बढ़ती ही जा रही हैं। अब इस मामले में जत्थेदार बाबा निहाल सिंह ने विस्तार से अपना पक्ष रखा और सभी आरोपों को बेबुनियाद बताया।

उन्होंने कहा कि हरियां वेलां संस्था और लौ लंगर की संपत्ति के बारे में फैलाई जा रही बातें तथ्यों से परे हैं और कुछ लोग जानबूझकर संगत के बीच भ्रम पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं। बाबा निहाल सिंह ने कहा कि जब उन्हें 1967 में संस्था की जिम्मेदारी सौंपी गई थी, तब संस्था के पास खेती योग्य केवल 9 एकड़ जमीन थी। गुरु साहिब की कृपा और संगत के सहयोग से 150 एकड़ से ज्यादा जमीन खरीदी गई और उसे लौ लंगर के नाम किया गया। उन्होंने साफ किया कि लौ लंगर की जमीन को न तो कानूनी तौर पर बेचा जा सकता है, न ही किसी को दिया जा सकता है और न ही इसका इस्तेमाल निजी कामों के लिए किया जा सकता है। अगर वे चाहते तो यह जमीन अपने नाम करवा सकते थे, लेकिन उन्होंने हमेशा भरोसे को तोड़ने से परहेज किया और सारी संपत्ति संस्था और लौ लंगर के नाम कर दी।

होशियारपुर के प्रेमगढ़ की जमीन के बारे में बात करते हुए बाबा निहाल सिंह ने कहा कि शेर-ए-पंजाब नर्सरी के बाबा बलकीर सिंह ने अपनी चल और अचल संपत्ति स्वेच्छा से एक रजिस्टर्ड वसीयत के जरिए उनके नाम कर दी थी। बाबा बलकीर सिंह की इच्छा के अनुसार गुरुद्वारा माता साहिब कौर जी का निर्माण किया गया और बाद में एक प्लॉट बीबी जसपाल कौर के नाम ट्रांसफर किया गया।

बीबी जसपाल कौर के बारे में उन्होंने कहा कि वे 3 दशकों से ज्यादा समय से संस्था से जुड़ी हुई हैं और कनाडा से आने के बाद अपना समय, मेहनत और दशवंध गुरु घर की सेवा में समर्पित कर रही हैं। उनके योगदान की वजह से गुरु हर राय साहिब कॉलेज में ज्ञान सागर लाइब्रेरी, ऐतिहासिक स्थलों के संरक्षण, स्मारकों और अन्य विकास कार्यों को अंजाम दिया गया है। प्लॉट बेचकर मिले पैसे के बारे में उन्होंने कहा कि यह रकम उनके बैंक खाते में है और इसे सिर्फ गुरुद्वारा हरियां वेलां की सेवा में ही खर्च किया जाएगा। उन्होंने चुनौती देते हुए कहा कि अगर कोई यह साबित कर दे कि एक रुपया भी निजी इस्तेमाल के लिए खर्च हुआ है, तो वे पंथ द्वारा दी जाने वाली हर सजा भुगतने को तैयार हैं।

आनंदपुर साहिब में स्थित गुरुद्वारा अजीतगढ़ के बारे में उन्होंने कहा कि उन्होंने वहां बनी दुकानों और अन्य आय से कभी कोई निजी फायदा नहीं उठाया। उन्होंने दावा किया कि सालों से स्थानीय प्रशासन के इंचार्ज से कभी हिसाब-किताब नहीं मांगा गया। कुछ लोग जत्थेदार बनने की चाहत में विवाद पैदा कर रहे हैं। बाबा निहाल सिंह ने कहा कि वे खुद को जत्थेदार नहीं बल्कि सेवादार मानते हैं और आज भी घोड़ों की सेवा से लेकर बाकी सारे काम खुद करते हैं।

इस मौके पर शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अध्यक्ष एडवोकेट हरजिंदर सिंह धामी ने भी अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया पर एकतरफा बातें फैलाई जा रही हैं और कोई भी आरोप लगाने से पहले दूसरे पक्ष की राय भी लेनी चाहिए। धामी ने कहा कि जिस गिफ्ट डीड (उपहार विलेख) का जिक्र हो रहा है, उसमें वे सिर्फ गवाह के तौर पर शामिल थे और इसमें उनका कोई निजी स्वार्थ नहीं है। हरियां वेलां संस्था के साथ उनका पुराना नाता है और इसी वजह से उनका नाम विवाद में घसीटा जा रहा है। अगर कोई गड़बड़ी या धोखाधड़ी हुई होती, तो सारे दस्तावेज और रिकॉर्ड सामने आ सकते थे। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ ताकतें जानबूझकर संस्था और उसके प्रमुख को निशाना बना रही हैं, जिसका समय आने पर पर्दाफाश हो जाएगा। आखिर में बाबा निहाल सिंह और एडवोकेट धामी ने श्रद्धालुओं से अपील की कि वे अफवाहों के बजाय तथ्यों पर भरोसा करें और पंथिक एकता बनाए रखें।

 

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