नई दिल्ली: देश भर के विभिन्न न्यायाधिकरणों (ट्रिब्यूनल) में लंबे समय से खाली पड़े पदों और उनके कामकाज को लेकर चल रहे मामले में केंद्र सरकार ने मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट को महत्वपूर्ण जानकारी दी। केंद्र ने अदालत को बताया कि नया ट्रिब्यूनल सुधार विधेयक (Tribunal Reforms Bill) तैयार करने का काम अंतिम चरण में पहुंच चुका है। सरकार ने संकेत दिए हैं कि इस विधेयक को संसद के मौजूदा मानसून सत्र में पेश करने की कोशिश की जाएगी।
मामले की सुनवाई भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ कर रही थी। सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने अदालत को बताया कि सरकार इस दिशा में तेजी से काम कर रही है और नया विधेयक लगभग तैयार है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर स्पष्ट किया कि देश के न्यायाधिकरणों को निष्क्रिय या कमजोर नहीं होने दिया जा सकता। अदालत ने कहा कि इन संस्थाओं का प्रभावी ढंग से काम करना न्याय व्यवस्था के लिए बेहद जरूरी है।
कोर्ट ने पहले भी केंद्र सरकार से कहा था कि पूरे देश के सभी ट्रिब्यूनलों के संचालन, नियुक्तियों और प्रशासन के लिए एक समान व्यवस्था तैयार की जाए। अदालत का मानना है कि अलग-अलग नियमों के कारण कई जगह कामकाज प्रभावित हो रहा है और इससे न्याय मिलने में देरी होती है।
मानसून सत्र में बिल लाने की कोशिश
सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा कि प्रस्तावित ट्रिब्यूनल सुधार विधेयक फिलहाल संसद के मानसून सत्र के एजेंडा में शामिल नहीं दिख रहा है।
इस पर अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने अदालत को जवाब देते हुए कहा, “हम कोशिश करेंगे।” इससे संकेत मिला कि सरकार इस विधेयक को जल्द से जल्द संसद में पेश करने का प्रयास करेगी।
पहले भी रद्द हो चुके हैं नियम
यह मामला नया नहीं है। नवंबर 2025 में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई और जस्टिस विनोद चंद्रन की पीठ ने ट्रिब्यूनल रिफॉर्म्स एक्ट, 2021 के तहत ट्रिब्यूनल सदस्यों की नियुक्ति और कार्यकाल से जुड़े कुछ नियमों को रद्द कर दिया था।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ये प्रावधान अदालत के पहले दिए गए फैसलों के अनुरूप नहीं थे। कोर्ट का मानना था कि जिन नियमों को पहले असंवैधानिक या अनुचित माना जा चुका था, उन्हें मामूली बदलाव के साथ दोबारा लागू किया गया।
राष्ट्रीय ट्रिब्यूनल आयोग बनाने का दिया था निर्देश
अपने पिछले फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को चार महीने के भीतर राष्ट्रीय ट्रिब्यूनल आयोग (National Tribunal Commission) बनाने का निर्देश भी दिया था।
अदालत ने कहा था कि ऐसा आयोग ट्रिब्यूनलों में नियुक्तियों, प्रशासन और उनके कामकाज को अधिक स्वतंत्र, पारदर्शी और एक समान बनाने में अहम भूमिका निभाएगा। इससे विभिन्न ट्रिब्यूनलों में मौजूद प्रशासनिक समस्याओं को दूर करने में भी मदद मिलेगी।
क्यों जरूरी है नया सुधार?
देश में कई ट्रिब्यूनलों में लंबे समय से न्यायाधीशों और सदस्यों के पद खाली पड़े हैं। इसके कारण हजारों मामलों की सुनवाई प्रभावित होती है और लोगों को समय पर न्याय नहीं मिल पाता।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि नया ट्रिब्यूनल सुधार विधेयक लागू होता है तो नियुक्ति प्रक्रिया अधिक व्यवस्थित हो सकती है। साथ ही ट्रिब्यूनलों की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ने की उम्मीद है।
सुप्रीम कोर्ट ने सुधारों पर दिया जोर
सुप्रीम कोर्ट ने अपने पहले के फैसलों में यह भी कहा था कि केवल छोटे-छोटे बदलावों से वर्षों से चली आ रही व्यवस्थागत समस्याओं का समाधान संभव नहीं है। अदालत के अनुसार, ट्रिब्यूनलों को मजबूत बनाने के लिए व्यापक और स्थायी सुधार आवश्यक हैं।
कोर्ट ने माना कि एक स्वतंत्र और प्रभावी राष्ट्रीय ट्रिब्यूनल आयोग भविष्य में नियुक्तियों, प्रशासन और संस्थागत स्वतंत्रता सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।
अब आगे क्या होगा?
अब सभी की नजर केंद्र सरकार पर है कि वह प्रस्तावित ट्रिब्यूनल सुधार विधेयक को संसद के मानसून सत्र में पेश करती है या नहीं। यदि यह विधेयक संसद में आता है और पारित हो जाता है, तो देश के न्यायाधिकरणों की नियुक्ति प्रक्रिया, प्रशासनिक व्यवस्था और कार्यप्रणाली में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि न्यायाधिकरणों को प्रभावी ढंग से चलाना न्याय व्यवस्था के लिए आवश्यक है और इस दिशा में केंद्र सरकार से ठोस कदम उठाने की अपेक्षा की जा रही है।
