सेहत: दुनिया एक बार फिर इबोला वायरस को लेकर एक्टिव हो गई है। डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो में इबोला के नए प्रकोप की पुष्टि हुई है। शुरुआती जेनेटिक जांच से संकेत मिले हैं कि यह वायरस कई हफ्तों में संभव है। कई महीनों से चुपचाप फैल रहा था। सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि इस नए स्ट्रेन के व्यवहार और इसकी क्षमता को लेकर अभी भी कई सवालों के जवाब नहीं मिले हैं।
ऐसे में दुनिया के कई देशों की तरह भारत में भी यह सवाल उठने लगा है कि क्या इस वायरस ने डरने की जरुरत है। एक्सपर्ट्स के अनुसार, इबोला उन वायरसों 1976 में पहली बार इबोला पर स्टडी किया था। बताते हैं कि यह वायरस व्यक्ति से व्यक्ति में मुख्य रुप से शारीरिक लिक्यूड के जरिए फैलता है। यही कारण है कि मरीजों की देखभाल करने वाले स्वास्थ्यकर्मी और परिवार के सदस्य सबसे अधिक जोखिम में रहते हैं।
शरीर में कैसे फैलता है
वायरस शरीर में प्रवेश करने के बाद सीधे इम्यून सिस्टम पर हमला करता है। जर्मनी की यूनिवर्सिटी ऑफ मेंज के वायरोलॉजी प्रोफेसर डॉ. बोडो प्लाख्टर के अनुसार, वायरस के पहले लसीका ग्लैंड में अपनी संख्या बढ़ाता है और फिर खून के जरिए शरीर के अलग-अलग अंगों तक पहुंच जाता है। यह उन सेल्स को निशाना बनाता है जो सामान्य परिस्थितियों में शरीर को इंफेक्शन से बचाती है। जब यह इम्यून सिस्टम कमजोर पड़ जाता है तो वायरस तेजी से पूरी शरीर में फैलने लगता है।
पहचानना क्यों होती है मुश्किल
इबोला की सबसे बड़ी चुनौती इसके शुरुआत लक्षण हैं। शुरुआत में मरीज को सामान्य बुखार, सर्दी, इंफेक्शन या मलेरिया जैसी परेशानी महसूस हो सकती है। कई बार मरीज को कुछ समय के लिए भी राहत भी महसूस होती है लेकिन इसके बाद गंभीर रुप ले सकती है। एक्सपर्ट्स के अनुसार, बाद के चरण में शरीर के विभिन्न हिस्सों में ब्लड निकलने जैसी स्थिति पैदा हो सकती है। यही वह समय होती है जब मरीज सबसे ज्यादा संक्रामक होता है और इंफेक्शन फैलने का खतरा बढ़ जाता है।
भारत में क्या स्थिति है?
भारत को कितना डरना चाहिए। मई 2026 तक भारत में इबोला का कोई पुष्ट मामला सामने नहीं आया है। हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली बेवसाइट क्लिनिक के एक्सपर्ट्स के आकलन के अनुसार, भारतीय आबादी के लिए फिलहाल सीधा खतरा कम है। देश के प्रमुख हवाई अड्डों पर निगरानी व्यवस्था, स्वास्थ्य जांच बड़े अस्पतालों में त्वरित जांच सुविधाएं और वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन की चेतावनी सिस्टम संभावित मामलों की पहचान में मदद कर रही है हालांकि अफ्रीकी देशों के साथ यात्रा और व्यापारिक संबंधों को देखते हुए सतर्कता बनाए रखना जरुरी माना जा रहा है।

