नई दिल्ली: आज की जिंदगी में इंसान शायद ही कभी सच में शांत बैठ पाता है। पहले लंबा सफर खिड़की के बाहर देखते हुए कट जाता था। लाइन में इंतजार करते समय लोग आस-पास की चीजों को महसूस करते थे। रात को सोने से पहले दिमाग खुद ब खुद धीमा पड़ जाता था लेकिन अब हर खाली पल किसी न किसी स्क्रीन से भर चुका है। कभी मोबाइल, नोटिफिकेशन, कभी छोटी वीडियो, कभी पॉडकॉस्ट तो कभी लगातार आने वाले मैसेज। ऐसे में दिमाग को असली आराम मिल ही नहीं पा रहा है।
क्या इससे हमारे ऊपर असर पड़ा रहा है
न्यूरोलॉजिस्ट्स का कहना है कि लगातार मिलने वाला यह बैकग्राउंड स्टिमुलेशन इंसान के दिमाग के काम करने के तरीके को बदल रहा है। बाहर से देखने पर भले कोई इंसान आराम करता दिखाई दे लेकिन दिमाग लगातार एक्टिव रहता है। यही कारण है कि आजकल लोग बिना ज्यादा शारीरिक मेहनत किए भी मानसिक रुप से थका हुआ महसूस करते हैं।
ब्रेन हमेशा एक्टिव रहने के लिए बना है
मीडिया इंटरव्यू के अनुसार, इंसानी दिमाग को कभी भी इस तरह लगातार एक्टिव रहने के लिए नहीं बनाया गया था। पहले दिनभर में छोटे-छोटे ऐसे पल मिल जाते थे, जब दिमाग खुद शांत हो जाता था लेकिन अब हर खाली जगह डिजिटल चीजों से भर चुकी है। स्मार्टफोन, सोशल मीडिया लगातार आने वाली नोटिफिकेशन और हर समय जुड़े रहने का दबाव इंसानी दिमाग को लगातार एक्टिव रखता है।
एक्सपर्ट्स बताते हैं कि यह समस्या थकान तुरंत महसूस नहीं होती है। लोगों को लगता है कि मोबाइल स्क्रॉल करना या देर रात तक वीडियो देखना आराम देने वाला काम होता है परंतु असल में दिमाग लगातार नई जानकारी को प्रोसेस करता रहता है। यही कारण है कि नर्वस सिस्टम हमेशा हल्की सतर्क अवस्था में बना रहता है।
धीरे-धीरे यह आदत मानसिक थकान, ध्यान की कमी और इमोशनल बर्नआउट में बदल सकती है। नेशनल इंस्टीट्यूटस ऑफ हेल्थ की रिसर्च में भी सामने आया है कि जरुरत से ज्यादा स्क्रीन देखने और देर रात तक डिजिटल चीजों में लगे रहने से नींद की क्वालिटी, इमोशनल संतुलन और ध्यान लगाने की क्षमता पर असर पड़ता है। खासतौर पर देर रात की लगातार स्क्रॉलिंग दिमाग को अलर्ट मोड में बनाए रखती है।
