जालंधर, ENS: जंतर-मंतर पर हो रहे छात्रों के प्रदर्शन को लेकर आदमपुर से विधायक सुखविंदर कोटली ने केंद्र पर जमकर निशाने साधे। उन्होंने कहा कि देश का शिक्षा सिस्टम आज इस स्तर पर गिर चुका है कि पेपर लीक के मामलों के कारण कई छात्र-छात्राओं को आत्महत्या के लिए मजबूर होना पड़ा है। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान की मिलीभगत के चलते ये मामले लगातार हो रहे हैं, इसलिए उनके इस्तीफे की मांग की जा रही है। पूरा देश का विद्यार्थी आज सड़कों पर है और जंतर-मंतर पर हो रहे प्रदर्शन का समर्थन कर रहा है। जब छात्र संसद का घेराव करने जा रहे हों, तो उन्हें शांति से भी समझाया जा सकता है, लेकिन उन पर लाठियां और पैलेट गन से गोलियां चलाई जा रही हैं। अगर छात्रों को इंसाफ नहीं मिलेगा और पेपर लीक होते रहेंगे, तो हमारे बच्चे कब तक आत्महत्या करते रहेंगे? आज जालंधर के अंदर हो रहे इस बड़े प्रदर्शन की हिमायत करने के लिए मैं पार्टी स्तर से ऊपर उठकर यहां आया हूं, क्योंकि छात्र भी यही चाहते थे कि हमें मिलकर संघर्ष लड़ना चाहिए।
जब इतने संघर्ष के बाद भी यह खबर सामने आ रही है कि महाराष्ट्र में टेट (TET) का पेपर लीक हो गया है, तो यह बेहद चिंताजनक है। यदि ऐसा लगातार हो रहा है, तो देश के प्रधानमंत्री को तुरंत पूरे देश से माफी मांगकर धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा लेना चाहिए और उन्हें मंत्रिमंडल से बाहर कर उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज कर जेल में डालना चाहिए। सरकार या प्रधानमंत्री को बार-बार अपनी ही सरकार के मंत्री के कारण क्यों शर्मिंदगी उठानी पड़ रही है? जालंधर के संघर्ष ने यह साबित कर दिया है कि देश और पंजाब का हर युवा और छात्र वर्ग दिल्ली के संघर्ष के समर्थन में सड़कों पर उतर आया है।
जब बीजेपी की तरफ से यह कहा जाता है कि छात्रों को विपक्षी दलों ने उकसाया है, तो यह बेबुनियाद है। विपक्ष और चुने हुए नुमाइंदों की यह जिम्मेदारी बनती है कि अगर किसी भी वर्ग के साथ अन्याय या ज्यादती हो, तो वे संसद के अंदर खड़े होकर सरकार से सवाल पूछें। राहुल गांधी लगातार संसद के अंदर चर्चा की मांग कर रहे हैं, लेकिन हाउस को एडजोइन करना पड़ रहा है और उन्हें बोलने तक का समय नहीं दिया जा रहा है। अगर संसद में बोलने नहीं दिया जाएगा, तो विपक्ष और नेता सड़कों पर उतरकर जनता और छात्रों की लड़ਾਈ लड़ेंगे। बीजेपी नेता विजय सांपला को शायद कोई जानकारी नहीं है कि संसद के अंदर क्या चल रहा है; उन्हें घरों से बाहर निकलकर टीवी देखना चाहिए ताकि पता चल सके कि विपक्ष को चर्चा के लिए कोई समय तक नहीं दिया जा रहा है।
केंद्र सरकार देश को तबाही के रास्ते पर ले जा रही है। जिन युवाओं को देश का इंजीनियर, वकील और डॉक्टर बनना है, अगर आप उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ करेंगे, तो देश के भविष्य की क्या उम्मीद की जा सकती है? यह सब केंद्र सरकार और आरएसएस के माध्यम से चलाया जा रहा है ताकि छात्र इसी तरह सड़कों पर रुल्ते रहें, लेकिन हम ऐसा बिल्कुल नहीं होने देंगे। लाठीचार्ज और हिंसा से बचने के लिए छात्रों को मंदिरों के कपाट बंद करने पड़े और मजबूर होकर गुरु घर (गुरुद्वारों) की ओट लेनी पड़ी, जहां जाकर उन्होंने अपनी जान बचाई। यहां तक कि जो छात्र वहां केवल माथा टेकने जाते थे, उन्हें भी अंदर नहीं जाने दिया गया, जो कि बेहद निंदनीय है। गुरुद्वारे, मंदिर और मस्जिद सभी के सांझे होते हैं। यदि गुरुघर के अंदर जाकर छात्रों को लंगर मिला या उन्होंने खुद को सुरक्षित किया, तो यह गुरुओं के उस पैगाम की मिसाल है जो हमेशा गरीबों, विद्यार्थियों और संघर्षशील लोगों की सहायता करता है। यह बाबा नानक की धरती और गुरु गोबिंद सिंह का देश है, जिसने हमें अन्याय के खिलाफ लड़ना सिखाया है।
कल सरकार और छात्रों के प्रतिनिधिमंडल की मीटिंग में दो मांगों पर तो सहमति जता दी गई, लेकिन मुख्य मांग—धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे—पर अभी तक सहमति नहीं बनी है। छात्रों द्वारा किए गए सुसाइड्स के लिए मुआवजा और मुकदमे वापस लेना तो सेकेंडरी बातें हैं, असली जिम्मेदार तो देश के शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र उनका इस्तीफा लेने से क्यों भाग रहे हैं? यदि बच्चे शांत हो सकते हैं और उन्हें इंसाफ मिल सकता है, तो प्रधानमंत्री चुप क्यों बैठे हैं? इसका मतलब यह है कि सरकार खुद कहीं न कहीं इस खेल में शामिल है और समझौते के चक्कर में इस आंदोलन को खत्म करना चाहती है, लेकिन बच्चों ने जो मजबूत स्टैंड लिया है, वह सराहनीय है।
बच्चे पीएम नरेंद्र मोदी से कोई अपनी जमीन-जायदाद नहीं मांग रहे हैं, वे तो केवल अपने ऊपर हुए जुल्म के खिलाफ इंसाफ की मांग कर रहे हैं। यदि देश के मंत्रियों और प्रधानमंत्री से इंसाफ की उम्मीद नहीं होगी, तो यह संघर्ष यूं ही जारी रहेगा और ये लोग प्रधानमंत्री को भी झुकाकर मानेंगे। यह बहुत चिंता का विषय है कि जिन छात्रों को कॉलेज और यूनिवर्सिटी में बैठकर पढ़ाई करनी चाहिए थी, उन्हें रातें जागकर सड़कों पर संघर्ष करना पड़ रहा है। इस दर्द को या तो वे माता-पिता समझ सकते हैं या फिर वे लोग समझ सकते हैं जो खुद संघर्षों की भट्ठी से उठकर आए हैं।

