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सुख-आश्रय के संरक्षण में जीवन के सबसे सुखद पलों का अनुभव कर रहे ‘चिल्ड्रन ऑफ द स्टेट’

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शिमला : जीवन में ऐसे अनेक अवसर आते हैं, जब व्यक्ति को केवल आर्थिक सहायता ही नहीं, बल्कि अपनत्व, सुरक्षा और मार्गदर्शन की भी आवश्यकता होती है। अधिकांश लोगों के लिए यह सम्बल उनके माता-पिता देते हैं, लेकिन जिन बच्चों के सिर से बचपन में ही माता-पिता का साया उठ जाता है, उनके लिए जीवन की राह असमय ही कठिन हो जाती है। अपनापन, सुरक्षा और भविष्य के प्रति विश्वास जैसी मूलभूत भावनाएं भी उनके जीवन से दूर होती चली जाती हैं। हिमाचल प्रदेश में भी लगभग 6,000 ऐसे निराश्रित बच्चे थे, जिनके जीवन में माता-पिता का सहारा नहीं था और भविष्य को लेकर अनेक अनिश्चितताएं थीं। सीमित संसाधनों और असुरक्षित परिस्थितियों के कारण उनके लिए उच्च शिक्षा, सम्मानजनक जीवन और आत्मनिर्भर भविष्य के सपने देखना भी संभव नहीं था। इन बच्चों के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने वर्तमान को सुरक्षित बनाना था, जबकि भविष्य की संभावनाएं उन्हें बहुत दूर दिखाई देती थीं।

ऐसे बच्चों के जीवन में उस समय एक नई आशा का संचार हुआ, जब हिमाचल प्रदेश सरकार ने उनके संरक्षण और समग्र विकास का दायित्व अपने हाथों में लेने का निर्णय लिया। 11 दिसम्बर, 2022 को मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविन्द्र सिंह सुक्खू ने प्रदेश की बागडोर सम्भालते ही यह संकल्प लिया कि समाज के सबसे संवेदनशील और वंचित वर्गों, विशेषकर निराश्रित बच्चों और महिलाओं, को सुरक्षा, सम्मान और अवसर प्रदान किए जाएंगे। यह संकल्प आगे चलकर एक ऐसी मानवीय पहल के रूप में चरितार्थ हुआ, जिसने हज़ारों बच्चों के जीवन की दिशा ही बदल दी। मुख्यमंत्री पद की शपथ ग्रहण करने के तुरन्त बाद शिमला में टूटीकंडी स्थित बालिका आश्रम पहुंचना केवल एक औपचारिक दौरा नहीं था, बल्कि यह साफ संदेश था कि प्रदेश सरकार निराश्रित बच्चों और बालिकाओं के साथ एक अभिभावक की तरह खड़ी है। आश्रम की बेटियों से संवाद कर मुख्यमंत्री ने उन्हें हर संभव सहयोग का भरोसा दिया, जिससे उनके मन में विश्वास और भविष्य के प्रति नई उम्मीद जागी।

आवश्यक प्रक्रियाएं पूरी करने के उपरान्त 28 फरवरी, 2023 को प्रदेश में मुख्यमंत्री सुख-आश्रय योजना लागू की गई। यह योजना हज़ारों अनाथ और निराश्रित बच्चों के जीवन में सुरक्षा, सम्मान और आत्मविश्वास का आधार बनी। योजना के अन्तर्गत 27 वर्ष तक के लगभग 6,000 बच्चों को सरकार ने एक अभिभावक की तरह चिल्ड्रन ऑफ द स्टेट के रूप में अपनाकर उनके पालन-पोषण, शिक्षा, कौशल विकास और आत्मनिर्भर भविष्य की जिम्मेदारी अपने ऊपर ली। सुख-आश्रय योजना ने इन बच्चों को केवल संरक्षण ही नहीं दिया, बल्कि उन्हें यह विश्वास भी दिया कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, उनके सपनों की उड़ान अब सीमित नहीं रहेगी। आज यह योजना हज़ारों बच्चों के लिए उस सुरक्षित कवच का पर्याय बन चुकी है, जहां उन्हें अपनापन, आगे बढ़ने के अपार अवसर और अपने सपनों को साकार करने का आत्मविश्वास एक साथ मिल रहा है।

चिल्ड्रन ऑफ द स्टेट के रूप में अपनाए गए प्रत्येक बच्चे की शिक्षा का सम्पूर्ण खर्च प्रदेश सरकार वहन कर रही है। परिवार में माता-पिता जिस प्रकार अपने बच्चों की आवश्यकताओं और छोटे-छोटे सपनों का ध्यान रखते हैं, उसी भावना के साथ सरकार उन्हें प्रतिमाह 4,000 रुपये जेब खर्च के रूप में भी प्रदान कर रही है। बाल एवं बालिका संस्थानों में रह रहे 14 वर्ष तक की आयु के बच्चों के खातों में प्रतिमाह 1,000 रुपये तथा 15 से 18 वर्ष आयु वर्ग के बच्चों के खातों में 2,500 रुपये प्रतिमाह जमा किए जा रहे हैं। बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में भी यह योजना विशेष रूप से कार्य कर रही है। अपना स्टार्ट-अप स्थापित करने के लिए उन्हें दो लाख रुपये तक की वित्तीय सहायता का प्रावधान किया गया है। उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे ऐसे विद्यार्थी, जिन्हें छात्रावास की सुविधा उपलब्ध नहीं है, उन्हें आवास किराये के लिए प्रतिमाह 3,000 रुपये दिए जा रहे हैं। अपना घर बसाने के लिए तीन लाख रुपये की वित्तीय सहायता उपलब्ध करवाई जा रही है तथा जिनके पास भूमि नहीं है, उन्हें सरकार द्वारा गृह निर्माण के लिए भूमि भी प्रदान की जा रही है।

इसके अतिरिक्त, लाभार्थियों को 500 रुपये उत्सव भत्ता, 10,000 रुपये वस्त्र अनुदान तथा विवाह के लिए दो लाख रुपये का अनुदान भी दिया जा रहा है। उनके सर्वांगीण विकास को ध्यान में रखते हुए निःशुल्क करियर काउंसलिंग, प्रतियोगी एवं व्यावसायिक पाठ्यक्रमों के लिए कोचिंग की सुविधा भी उपलब्ध करवाई गई है। साथ ही, उन्हें देश के विभिन्न हिस्सों में शैक्षणिक भ्रमण पर भेजा जा रहा है, ताकि वे नए अनुभव प्राप्त कर व्यापक दुनिया से परिचित हो सकें। इसका सारा खर्च भी राज्य सरकार उठा रही है। मुख्यमंत्री सुख-आश्रय योजना को प्रभावी बनाने के उद्देश्य से वर्ष 2023 से सितम्बर 2025 तक इसके अन्तर्गत लाभार्थियों पर लगभग 85.88 करोड़ रुपये व्यय किए गए हैं। राज्य सरकार कांगड़ा ज़िला के लुथान में लगभग 92.38 करोड़ रुपये की लागत से मुख्यमंत्री आदर्श ग्राम सुख-आश्रय परिसर का निर्माण कर रही है। यह आधुनिक आवासीय परिसर लगभग 400 आश्रितों के लिए सुरक्षित और सुविधासम्पन्न वातावरण उपलब्ध करेगा।

यह योजना निराश्रित बच्चों को कॉन्वेंट और अन्य प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में दाखिला दिलवाने में भी सराहनीय कार्य कर रही है। इसके तहत शिशु सुधार गृह की तीन बेटियों को शिमला स्थित कॉन्वेंट तारा हॉल स्कूल, पांच बच्चों को शिमला स्थित दयानन्द पब्लिक स्कूल, चार बच्चों को सोलन स्थित पाइनग्रोव स्कूल और दो बच्चों को मण्डी स्थित डीएवी स्कूल, सुन्दरनगर में दाखिला दिलवाया गया है। इनकी पढ़ाई का पूरा खर्च प्रदेश सरकार वहन कर रही है। इस योजना ने निराश्रित बच्चों के जीवन से जुड़ी उन चुनौतियों का भी समाधान किया है, जो वर्षों से उनके भविष्य की राह में बाधा बनी हुई थीं। प्रदेश सरकार ने ऐसे अनाथ बच्चों को बोनाफाइड हिमाचली प्रमाण-पत्र प्राप्त करने का अधिकार प्रदान किया है, जो पिछले 15 वर्षों से हिमाचल प्रदेश के विभिन्न बाल देखभाल संस्थानों में रह रहे हैं। पहले प्रचलित दिशा-निर्देशों में इस संबंध में कोई व्यवस्था न होने के कारण ये बच्चे प्रदेश की अनेक कल्याणकारी योजनाओं, शैक्षणिक सुविधाओं और रोज़गार के अवसरों का लाभ नहीं ले पाते थे। इस निर्णय ने न केवल उन्हें उनकी पहचान और अधिकार दिलाए हैं, बल्कि उनके लिए अवसरों के नए द्वार भी खोले हैं।

निराश्रित बच्चों के उज्ज्वल भविष्य को और अधिक सुदृढ़ आधार प्रदान करने के उद्देश्य से प्रदेश सरकार ने अपने अंशदान से 101 करोड़ रुपये के मुख्यमंत्री सुख-आश्रय कोष की स्थापना भी की है। इस कोष में आम नागरिक, सामाजिक संस्थाएं, औद्योगिक प्रतिष्ठान और विभिन्न कंपनियां भी स्वेच्छा से योगदान दे रही हैं। इस सामूहिक सहभागिता से प्राप्त धनराशि का उपयोग अनाथ बच्चों की उच्च शिक्षा, कौशल विकास तथा उनके समग्र भविष्य निर्माण के लिए किया जा रहा है। यह कोष केवल आर्थिक सहायता का माध्यम नहीं, बल्कि समाज और सरकार की साझा संवेदनशीलता तथा इस संकल्प का प्रतीक है कि प्रदेश का कोई भी बच्चा केवल परिस्थितियों के कारण अपने सपनों से वंचित न रह जाए।
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