ऊना,सुशील पंडित: वर्षों से इंडियन मेजर कार्प के प्रजनन में एक ऐसी समस्या सामने आ रही थी, जिसमें तैयार होने वाले 95 से 98 प्रतिशत तक स्पॉन नष्ट हो जाते थे। ‘एयर बबल’ बीमारी के कारण दियोली कार्प फार्म में स्वस्थ मत्स्य बीज तैयार करना बड़ी चुनौती बना हुआ था। अब इस बीमारी पर शत-प्रतिशत नियंत्रण हासिल कर लिया गया है। सीफा, भुवनेश्वर के वैज्ञानिक सहयोग, विशेष फीड, तकनीकी प्रशिक्षण और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप जल गुणवत्ता प्रबंधन में किए गए सुधारों से मिली इस सफलता ने हिमाचल में स्थानीय स्तर पर गुणवत्तापूर्ण मत्स्य बीज तैयार करने की नई संभावना पैदा की है।
मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंद्र सिंह सुक्खू का प्रदेश में ब्लू इकोनॉमी को बड़े पैमाने पर बढ़ावा देने पर जोर है। उनके नेतृत्व में प्रदेश सरकार किसानों और मत्स्य पालकों की आय बढ़ाने तथा स्थानीय संसाधनों की क्षमता मजबूत करने पर जोर दे रही है। दियोली कार्प फार्म में वर्षों पुरानी तकनीकी चुनौती का समाधान इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
मत्स्य विभाग ऊना के सहायक निदेशक विवेक शर्मा ने बताया कि इस वर्ष विभाग करीब एक करोड़ स्पॉन तैयार कर 8 से 10 लाख स्वस्थ अंगुलिकाएं विकसित करने के लक्ष्य के साथ आगे बढ़ रहा है। उन्होंने बताया कि इस सफलता का असर दियोली तक सीमित नहीं रहेगा। तैयार अंगुलिकाओं का उपयोग गोविंद सागर और पौंग डैम सहित प्रदेश के प्रमुख जलाशयों में मत्स्य संवर्धन के लिए किया जाएगा। स्थानीय स्तर पर गुणवत्तापूर्ण बीज उपलब्ध होने से बाहरी राज्यों पर निर्भरता कम होगी और इसका लाभ आगे चलकर मत्स्य पालकों तथा जलाशयों पर निर्भर मछुआरों तक पहुंचेगा।
पहले 100 में से 95 से 98 स्पॉन हो जाते थे नष्ट
विवेक शर्मा ने बताया कि इंडियन मेजर कार्प के प्रजनन में ‘एयर बबल’ की समस्या लंबे समय से बड़ी चुनौती थी। स्पॉन तैयार होने के बाद उनमें एक विशेष शारीरिक समस्या उत्पन्न होती थी, जिससे 95 से 98 प्रतिशत तक स्पॉन नष्ट हो जाते थे। इसका सीधा असर स्वस्थ अंगुलिकाओं के उत्पादन पर पड़ता था। यानी बड़ी संख्या में स्पॉन तैयार करने के बावजूद उनका बहुत छोटा हिस्सा ही आगे विकसित हो पाता था।
वैज्ञानिक सहयोग से तलाशा गया समाधान
उन्होंने बताया कि समस्या के समाधान के लिए मत्स्य विभाग ने सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ फ्रेशवाटर एक्वाकल्चर (सीफा), भुवनेश्वर के साथ तकनीकी सहयोग के लिए एमओयू किया। वैज्ञानिकों की सलाह पर विशेष ‘सीफा ब्रूड फीड’ का प्रयोग शुरू किया गया। विभागीय अधिकारियों को भुवनेश्वर में आधुनिक प्रजनन तकनीकों और जल गुणवत्ता प्रबंधन का प्रशिक्षण भी दिया गया।
इसके बावजूद समस्या का पूर्ण समाधान नहीं हो पा रहा था। इस वर्ष विभाग ने दियोली की स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए पानी की गुणवत्ता से जुड़े विभिन्न मानकों में आवश्यक बदलाव किए। इन तकनीकी सुधारों के बाद ‘एयर बबल’ की समस्या पर शत-प्रतिशत नियंत्रण हासिल करने और स्वस्थ स्पॉन तैयार करने में सफलता मिली।
एक करोड़ स्पॉन से 8 से 10 लाख स्वस्थ अंगुलिकाओं का लक्ष्य
अब विभाग इस सफलता को बड़े पैमाने पर उत्पादन में बदलने की तैयारी में है। इस वर्ष करीब एक करोड़ स्पॉन तैयार करने और उनमें से 8 से 10 लाख स्वस्थ अंगुलिकाएं विकसित करने का लक्ष्य रखा गया है। स्थानीय स्तर पर स्वस्थ और गुणवत्तापूर्ण मत्स्य बीज उपलब्ध होने से प्रदेश के मत्स्य पालकों को लाभ मिलेगा और बाहर से बीज मंगाने पर निर्भरता में कमी आएगी।
दियोली से निकलेगा बीज, पहुंचेगा प्रदेश के जलाशयों तक
दियोली कार्प फार्म में मुख्य रूप से छह प्रमुख प्रजातियों का संवर्धन एवं प्रजनन किया जाता है। इनमें कॉमन कार्प, अमूर कार्प, कोई कार्प और इंडियन मेजर कार्प (आईएमसी) प्रमुख हैं। पिछले 10–15 वर्षों से फार्म में कॉमन कार्प और अमूर कार्प का प्रजनन अत्यंत सफलतापूर्वक किया जा रहा है। फार्म में सामान्य तौर पर प्रतिवर्ष करीब दो करोड़ स्पॉन तैयार किए जाते हैं। तैयार मत्स्य बीज स्थानीय किसानों और मत्स्य पालकों को उपलब्ध कराया जाता है, जबकि शेष मत्स्य बीज का उपयोग प्रदेश के प्रमुख जलाशयों में मत्स्य संवर्धन के लिए किया जाता है।
इस वर्ष तैयार की जाने वाली स्वस्थ अंगुलिकाओं को गोविंद सागर, पौंग डैम सहित प्रदेश के प्रमुख जलाशयों में स्टॉक किया जाएगा। इससे इन जलाशयों में मत्स्य संवर्धन को बढ़ावा देने का आधार और मजबूत होगा।
बाहर से बीज मंगाने की जरूरत होगी कम
विवेक शर्मा ने बताया कि हिमाचल अब तक मत्स्य बीज की उपलब्धता के मामले में बाहरी राज्यों पर निर्भर रहा है। गोविंद सागर और पौंग डैम जैसे बड़े जलाशयों के लिए हर साल दूसरे राज्यों से मत्स्य बीज मंगवाना पड़ता था, जिससे सरकारी खजाने पर वित्तीय बोझ पड़ता था। अब दियोली कार्प फार्म में स्थानीय स्तर पर गुणवत्तापूर्ण मत्स्य बीज उपलब्ध होने से बाहरी राज्यों पर निर्भरता कम होगी। इससे प्रदेश में उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग होगा और मत्स्य बीज पर होने वाले सरकारी व्यय में भी कमी आएगी।
जलाशयों में स्टॉकिंग से बढ़ेगा मत्स्य उत्पादन, मछुआरों को होगा लाभ
तैयार की जाने वाली स्वस्थ अंगुलिकाओं को गोविंद सागर, पौंग डैम सहित प्रदेश के प्रमुख जलाशयों में स्टॉक किया जाएगा। इससे जलाशयों में मछली के उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा और स्थानीय मछुआरों को बेहतर पकड़ मिलने की संभावना बढ़ेगी। इसका सीधा लाभ उनकी आय और आजीविका पर पड़ेगा।
मत्स्य विभाग की इस सफलता से प्रदेश स्थानीय स्तर पर गुणवत्तापूर्ण मत्स्य बीज उत्पादन में स्वावलंबी बनने की दिशा में आगे बढ़ने के साथ ही इससे मत्स्य पालकों और जलाशयों पर निर्भर मछुआरों के आर्थिक उत्थान का मार्ग भी मजबूत होगा।
सफलता को उत्पादन में बदलने पर फोकस
वर्षों पुरानी समस्या पर शत-प्रतिशत नियंत्रण हासिल करने के बाद अब विभाग का फोकस इस सफलता को लगातार बनाए रखने और निर्धारित लक्ष्य के अनुरूप स्वस्थ अंगुलिकाओं का उत्पादन करने पर है। 8 से 10 लाख स्वस्थ अंगुलिकाओं का लक्ष्य हासिल होने पर प्रदेश में स्थानीय मत्स्य बीज उत्पादन की क्षमता को नई मजबूती मिलेगी।
दियोली में शुरू हुआ यह बदलाव अब फार्म की सीमाओं से आगे बढ़कर प्रदेश के जलाशयों तक पहुंचने की तैयारी में है। स्वस्थ मत्स्य बीज से मत्स्य संवर्धन मजबूत होगा और इसकी पूरी श्रृंखला का अंतिम लाभ हिमाचल के मछुआरों की आजीविका तक पहुंचेगा।