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आखिर क्यों खास होता है भगवान जगन्नाथ रथयात्रा की रस्सी को खींचना? जानें पौराणिक कथा

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धर्म: भगवान जगन्नाथ की विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा आज से शुरु हो गई है। यह यात्रा 24 जुलाई को खत्म होगी। भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि कई लोगों की आस्था, समर्पण और भक्ति का एक महासागर होता है। हर साल आषाढ़ महीने की शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को ओडिशा के पुरी में निकलने वाली यह यात्रा पूरे विश्व के श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित कर देती है। इस यात्रा में शामिल होने के लिए और भगवान के रथ की रस्सियों को खींचने का अपना एक खास महत्व होता है।

इस वजह से शुभ है रथ की रस्सी खींचना

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान जगन्नाथ के रथ को खींचने वाली रस्सी को शंखचूड़ का प्रतीक माना जाता है। पुराणों में इस बात का जिक्र मिलता है कि जो भी श्रद्धालु रथ की रस्सी को छूता है या उसको खींचता है। उसके जीवन के सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। इसे साक्षात मोक्ष का द्वार माना गया है। ऐसा माना जाता है कि रथ को खींचने वाला व्यक्ति सीधे प्रभु के चरणों में स्थान पाता है और जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति की ओर बढ़ता है।

रथ यात्रा से जुड़ी पौराणिक कथा

रथ यात्रा के पीछ वैसे तो कई सारी कथाएं हैं। ऐसा कहा जाता है कि भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ में अपनी मौसी के घर में जाते हैं। इस यात्रा के दौरान भगवान खुद ही भक्तों के बीच में आते हैं ताकि जो भी लोग मंदिर के गृभगृह तक नहीं पहुंच पाते हैं। वो भी प्रभु के दर्शन का लाभ उठा पाएं। रथ की रस्सी को खींचने एक तरह से खुद को प्रभु को रथ का सारथी बनाने जैसा है। ऐसे ही अर्जुन का सारथी खुद श्रीकृष्ण बने थे। उसी तरह से रथ खींचने वाले श्रद्धालु इस प्रक्रिया के जरिए से प्रभु से सीधा जुड़ाव महसूस करते हैं।

रस्सी खींचने का यह है महिमा

मोक्ष की मिलेगी प्राप्ति

मान्यता है कि जो व्यक्ति रथ की रस्सी को हाथ लगाता है या उसको खींचता है। वह वैकुंठ लोक का अधिकारी बन जाता है।

प्रेम और समरसता का भाव

जगन्नाथ पुरी की रथ यात्रा जाति-पाति और ऊंच-नीच के भेदों को भी मिटाती है। यहां राजा हो या रंक सभी एक ही रस्सी को थामकर अपने आराध्य को खींचते हैं। यह प्रेम और समरसता का सबसे बड़ा उदाहरण है।

पिछले जन्मों के धुलेंगे पाप

ऐसा माना जाता है कि रथ खींचना सिर्फ एक शारीरिक क्रिया ही नहीं है बल्कि यह घमंड को खत्म करने का भी प्रतीक है। रस्सी को पकड़ते ही भक्त का सारा अहंकार प्रभु के चरणों में समर्पित हो जाता है। इससे उसके पिछले जन्मों के पाप धुल जाते हैं।

भक्तों का लगता है सैलाब

रथ यात्रा के दौरान जय जगन्नाथ के जयकारों से माहौल भक्तिमय हो जाता है। जब भक्त विशाल रथ को एकासाथ खींचते हैं तो वह दृश्य काफी अच्छा होता है। यह श्रद्धा का ऐसा अद्भूत क्षण होता है जहां पर भक्त और भगवान के बीच में कोई दूरी ही नहीं रहती है। आखिर में यात्रा हमें यह संदेश देती है कि जीवन रुपी रथ की डोर यदि आप भगवान के हाथों में देंगे तो संसार का हर कठिन रास्ता आसान बन जाएगा।

 

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