शिमला: हिमाचल की पहाड़ियों से निकलने वाली कई राहें देश की सीमाओं तक जाती हैं। इन राहों पर चलकर प्रदेश की पीढ़ियों ने राष्ट्रसेवा को अपना जीवन-धर्म बनाया है। यहां सेना में जाना केवल नौकरी पाना नहीं, बल्कि परिवार और समाज की उस गौरवशाली परंपरा को आगे बढ़ाना है, जिसमें साहस, अनुशासन और देश के प्रति समर्पण सबसे ऊपर हैं। कांगड़ा और मंडी से लेकर शिमला, कुल्लू और प्रदेश के दूर-दराज के इलाकों तक सैन्य सेवा हिमाचल की पहचान का ऐसा हिस्सा है, जिसे पीढ़ियां गर्व के साथ आगे बढ़ाती रही हैं।
मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविन्द्र सिंह सुक्खू के नेतृत्व में वर्तमान राज्य सरकार पूर्व सैनिकों, उनके परिवारों और देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाले सैनिकों के परिवारों के कल्याण को प्राथमिकता दे रही है। प्रयास यह है कि जिन लोगों ने देश की सुरक्षा में अपना महत्वपूर्ण समय और जीवन दिया, उन्हें घर लौटने के बाद भी सुरक्षा, सम्मान, रोजगार और अवसरों का भरोसा मिले।
देशसेवा की इस लंबी परंपरा में उन बुजुर्ग सैनिकों को भी सम्मान के साथ याद रखा गया है, जिन्होंने प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सेवा दी। गैर-पेंशनभोगी पूर्व सैनिकों को 10,000 रुपये प्रतिमाह वृद्धावस्था पेंशन दी जाती है, जबकि उनकी विधवाओं को 5,000 रुपये प्रतिमाह की सहायता मिलती है।
वीरता का सम्मान भी अपनी जगह कायम है। असाधारण साहस दिखाने वाले वीरता पुरस्कार विजेताओं को एकमुश्त 30 लाख रुपये तक की वित्तीय अनुदान राशि दी जाती है। वहीं, विशिष्ट सेवा पुरस्कार विजेताओं को 3,000 रुपये से 17,000 रुपये तक के वित्तीय लाभ प्रदान किए जाते हैं।