वाशिंगटनः अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने एच-1बी (H-1B) वीजा कार्यक्रम को लेकर बड़ा बयान देते इसमें कड़े प्रशासनिक बदलाव करने के संकेत दिए हैं। उन्होंने साफ किया कि सरकार का मुख्य मकसद इस वीजा प्रणाली को स्थानीय अमेरिकी पेशेवरों की जगह कम वेतन वाले विदेशी कामगारों को भरने से रोकना और दुनिया के बेहतरीन टेलेंट को देश में लाना है। लोकप्रिय बिजनेस और टेक्नोलॉजी शो ‘ऑल-इन पॉडकास्ट’ में बातचीत के दौरान वेंस ने स्पष्ट किया कि वीजा नियमों में बड़े सुधार किए जा रहे हैं ताकि इसका दुरुपयोग पूरी तरह बंद हो सके।
पॉडकास्ट में बोलते उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने विधायी गतिरोध की चर्चा की। उन्होंने कहा कि संसद (कांग्रेस) में राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण इस पर कानून पास होना फिलहाल संभव नहीं दिख रहा था। इसी वजह से प्रशासन ने अपने स्तर पर कार्यकारी कदम उठाने का फैसला किया है। वेंस ने कहा कि सिस्टम में बड़े पैमाने पर फर्जीवाड़ा देखने को मिला है, जिसे रोकने के लिए यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि यदि कोई टेक कंपनी किसी को H-1B वीजा पर बुलाती है, तो वह उम्मीदवार असल मायनों में कोई असाधारण प्रतिभा (जीनियस) होना चाहिए।
उपराष्ट्रपति ने कंपनियों की नीतियों पर सवाल उठाते कहा कि इस कार्यक्रम का असली उद्देश्य अमेरिकी अर्थव्यवस्था और तकनीकी तंत्र को समृद्ध बनाना है। उन्होंने उदाहरण देते समझाया कि यदि कोई कंपनी 60 हजार डॉलर कमाने वाले स्थानीय अकाउंटेंट को नौकरी से निकालकर उसकी जगह 45 हजार डॉलर में विदेशी कर्मचारी रख रही है, तो यह कतई स्वीकार्य नहीं है। H-1B वीजा कार्यक्रम को सस्ते विदेशी कामगारों की भर्ती का जरिया बनने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
कंपनियों के दोहरे रवैये पर कड़ा प्रहार करते जेडी वेंस ने बताया कि प्रशासन H-1B वीजा आवेदन पर 1,00,000 डॉलर (करीब 83 लाख रुपए) का भारी-भरकम शुल्क लगाने पर विचार कर रहा है। इसके साथ ही उन कंपनियों पर भी सख्त पाबंदी लगाने की योजना है जो अपने यहां अमेरिकी कर्मचारियों की छंटनी करती हैं और फिर विदेशी कामगारों की मांग करती हैं।
वेंस ने तंज कसते कहा कि यह बेहद हास्यास्पद है कि कंपनियां पहले 5,000 स्थानीय कर्मियों को नौकरी से निकाल देती हैं और फिर दावा करती है कि उन्हें योग्य कर्मचारी नहीं मिल रहे हैं। उन्होंने साफ किया कि कानूनी दायरे में रहकर नियमों को पूरी मजबूती से लागू किया जाएगा।