ऊना/सुशील पंडित: हिमाचल प्रदेश के जिला ऊना उपमंडल की ग्राम पंचायत झंंबर में गांव वासियों के सानिध्य में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के पांचवें दिन चौथे क्षेत्र के सुप्रसिद्ध कथावाचक आचार्य तरुण डोगरा महाराज ने अपने मुखारविंद अम्रत बर्षा करते हुए कहा कि भागवत सुनने से मनुष्य की जिंदगी में परिवर्तन आता है और भागवत कथा सुनने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। उन्होंने कहा कि जो मंगल कलश होता है वह धर्म का प्रतीक है, वह हमेशा शुभ कार्य में स्थापित होता है और जब हम कोई धर्म कार्य करते है, तो उसकी स्थापना के लिए हम उसे स्थापित करते है। श्रीमद भागवत कथा हमें मोक्ष प्रदान करने वाली है, जो इसको भावपूर्वक सुनता है उसका कल्याण होना अनिवार्य है।
उन्होंने कहा कि भगवान श्री सत्यनारायण जी का व्रत व तप करने से मनुष्य का जीवन सफल हो जाता है। और प्रभू भक्ति व सुमिरण करने से कभी भी भय नहीं होता तथा जीवन के अंत में प्राणी को कोई भी कष्ट नहीं होता। उन्होने बताया कि श्रीमदभागवत कथा में बताया गया है कि जो प्राणी कलयुग में भगवान का भजन करेंगे, उन्हें कोई कष्ट-कलेश नहीं होगा। उन्होने बताया कि इस धरती पर जीव अकेला पैदा हुआ था और अकेला ही इस संसार को छोड़कर जाएगा। वह इस संसार में जो भी भले-बुरे कर्म करता है, उनका भुगतान भी उसे स्वंय ही भुगतना पड़ता है। उन्होने कहा कि किस प्रकार भगवान ने अनेक अवतारों में जन्म लेकर इस धरती को अधर्म से धर्म के मार्ग पर चलाया था और आज उस प्रभु के द्वारा ये सारी सृष्टि रचित है जिसे इस धरती का एक-एक जीव जानता है लेकिन आज के इस युग में लोग भगवान को न मानकर अपने आपको स्वंय भगवान का स्थान देने लगे हैं। जिससे इस धरती पर प्रलय आने का भी योग बन सकता है क्योंकि अगर ये मानव रूपी जीवन स्वंय ही भगवान बन जाए तो इस सारी सृष्टि का संचार कौन करेगा? उन्होने भक्तों को बताया कि बर्ष में एक बार इस मानव रूपी जीवन को सुप्रसिद्ध स्थान गया जी में जाकर अपने पूर्वजों का भगवान को साक्षी मानकर पिंडदान जरूर करना चाहिए, ताकि हमारे इस नश्वर जीवन का उद्धार हो सके।
उन्होने कहा कि भगवान को पाना है तो प्रभु सिमरन मात्र से ही हमारे पास पंहुच जाते हैं। उन्होने कृष्णमय प्रवचनों की बौछार करते हुए कहा कि जो व्यक्ति प्रभु की शरण में जाता है भगवान स्वयं ही उसका बेड़ा पार लगा देते हैं क्योंकि प्रभु का नाम लेने मात्र से ही सब पाप धुल जाते हैं। उन्होने हजारों की तादाद में बैठे श्रद्धालुओं को संदेश देते हुए कहा कि प्रभु सिमरन करने व प्रभु के दिखाए मार्ग पर चलने से ही मोक्ष प्राप्त हो सकता है। उन्होने कहा कि हमें प्रभु भजन करने के लिए ही भगवान ने इस धरती पर जन्म देकर भेजा है। जब हम भजन करेगें तो भगवान हमें अवश्य ही मुक्ति देगें। उन्होने बताया कि रामायण से हमें जीने की सीख मिलती है और श्रीमदभागवत कथा हमें मरना सीखती है। क्योंकि ये मानव जीवन एक हवा का झोंका है जो आता है और चला जाता है। यदि हम चाहते हैं कि हमारा भगवान से मिलन से हो, तो हमें अपनी मृत्यु से डरना नहीं चाहिए। यदि हम कहीं भी भागवत कथा सुनने आते हैं तो हमें वहां से परम सौभाग्य लेकर जाना चाहिए। उन्होने कहा कि हमें भागवत कथा सिर्फ सुनना ही नहीं, बल्कि इसको अपने जीवन में भी उतारना चाहिए। उन्होंने कहा कि अच्छे लोगों की परीक्षा हर काल-खण्ड में होती रही है और परमात्मा उनका साथ देते रहे है, किन्तु बुरे लोगों को दौलत, पद, प्रतिष्ठा देकर परमात्मा उनका साथ छोड़ते रहे है। उन्होने कहा कि शिक्षा खुद को धनी, प्रतिष्ठित बनाने से ज्यादा उचित है कि अपने को अच्छा बनाओ, ताकि परमात्मा हमारे साथ हमेशा रहे।
उन्होंने श्रीमद्भगवत कथा का बख्यान करते हुए बताया कि जब हम कोई कार्य करते हैं, यानी अपना दिया गया कर्तव्य पूरी निष्ठा से नहीं करते हैं तो न केवल अपने कर्म को धोखा देते हैं, बल्कि स्वयं अपने आप को धोखा देते हैं। क्योंकि कर्म करने वाले को इतनी हानि नहीं होती, जितनी साधारणतः कमतर कार्य करने से स्वयं अपने आप को होती है। उन्होने कहा कि अगर हम अपने किए हुए कर्तव्य को निष्ठा से पूर्ण नहीं करते तो हमें आलस्य दबा लेगा और फिर हम वैसा साधारण कार्य ही करने के अभ्यस्त हो जाएंगे। परंतु हमें पूरी निष्ठा से किये गए श्रेष्ठ कार्य जिसमें अपेक्षाकृत अधिक ध्यान, श्रम, अध्यवसाय लगते हैं, हमें वही कार्य करने चाहिए, जिससे हमारा आत्मविश्वास धीरे-धीरे समाप्त न होकर आगे बढ़ता रहे और एक दिन ऐसा आएगा, जिससे हमारे द्वारा किए गए कर्मो का फल हमें स्वर्ग और नर्क की ओर स्वयं परिणामस्वरूप ले जाएगा। उन्होने भागवत ज्ञान की गंगा बहाते हुए कहा कि हम जो कुछ करें, चाहे वह घर का कार्य हो या दुकान, आफिस अथवा सार्वजनिक सेवा के क्षेत्र का और जिसमें हमें चाहे आय भी कम हो, फिर भी हम अपने कार्य को अधूरे रूप से न करें। उन्होने कहा कि हमारी इन सभी बातों की मौलिकता और कुशलता की सर्वत्र प्रशंसा होगी। वहीं स्वयं हमारी अंतरात्मा भी इससे संतुष्ट होगी।
उन्होंने प्रवचनों कि अमृत बर्षा करते हुए कहा कि कथा और सत्संग में ऐसी शक्ति होती है कि यह मनुष्य के मन के बुरे विचारों को निकाल देता है और उसमें शुद्ध विचार पैदा होते हैं इससे सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलती है। परमात्मा की भक्ति करने के लिए मनुष्य में लालसा पैदा होती है। परमात्मा की कृपा से फिर उसका मिलन संतों से होता है। जब संतों का मिलन हो जाए, तो फिर मनुष्य का कल्याण ही कल्याण है। फिर जैसे गुरु कहें, उसके अनुसार अपने जीवन को बना लें और बुरे विचारों को अपने मन में न आने दें। फिर जब ईश्वर की मनुष्य पर पूरी कृपा हो जाती है, तो हमें गुरु दीक्षा भी मिल जाती है। जब हर रोज मनुष्य प्रभु सुमिरन करता है तो अंदर से रस आना शुरू हो जाता है। उन्होंने कहा कि प्रभु सुमिरन एक ऐसा रस है जिसके आगे दुनिया की सभी चीजें फीकी नजर आती हैं। जब भक्ति का रस आना शुरू हो गया, तो फिर हमारा ध्यान दुनियां से हटकर परमात्मा में लग जाता है फिर प्रभु से मिलने की तड़़प पैदा होती है। प्रभु सुमिरन करते हुए जब मनुष्य तड़़प में परमात्मा को पुकारता है, तो प्रभु उसे अवश्य दर्शन देते है। इस दौरान उन्होने सब संगतों को “हरे कृष्ण हरे कृष्णा, कृष्ण कृष्ण हरे-हरे, हरे राम हरे रामा, राम-राम हरे हरे” भक्ति भजन सुनाकर मंत्रमुग्ध कर दिया।