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कलश यात्रा के साथ बदोली में श्रीमद् भागवत कथा का शुभारंभ

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ऊना/सुशील पंडित: श्रीमद्भागवत कथा का शुभारंभ गांव बदोली के ठाकुरद्वारा प्रांगण में हुआ ,कथा से पूर्व एक कलश यात्रा निकाली गई। श्रीमद्भागवत कथा में पहले दिन कथावाचक पंडित गणेश दत्त शास्त्री ने उपस्थित श्रद्धालुओं को सर्वप्रथम श्रीमद् भागवत महिमा से अवगत कराया।कथा व्यास गणेश दत्त शास्त्री ने बताया कि विश्व में सभी कथाओं में श्रीमद् भागवत कथा श्रेष्ठ मानी गई है। जिस स्थान पर इस कथा का आयोजन होता है, वो तीर्थ स्थल कहलाता है। इसको सुनने एवं आयोजन कराने का सौभाग्य भी प्रभु प्रेमियों को ही मिलता है। ऐसे में अगर कोई दूसरा अन्य भी इसे गलती से भी श्रवण कर लेता है, तो भी वो कई पापों से मुक्ति पा लेता है। इसलिए सात दिन तक चलने वाली इस पवित्र कथा को श्रवण करके अपने जीवन को सुधारने का मौका हाथ से नहीं जाने देना चाहिए। अगर कोई सात तक किसी व्यस्तता के कारण नहीं सुन सकता है, तो वह दो तीन या चार दिन ही इसे सुनने के लिए अपना समय अवश्य निकाले तब भी वो इसका फल प्राप्त करता है, क्योंकि ये कथा भगवान श्री कृष्ण के मुख की वाणी है।

वहीं कथा व्यास गणेश दत्त शास्त्री जी ने धुंधकारी प्रकरण की सुंदर व्याख्या की। उन्होंने बताया कि तुंगभंगा नदी के किनारे के एक गांव था वहां पर आत्म देव नाम का एक ब्राह्मण और उसकी पत्नी धुंधली रहती थी आत्म देव तो सज्जन था लेकिन उसकी पत्नी दुष्ट प्रवृति की थी। ब्राह्मण आत्म देव बहुत उदास रहता था क्योंकि उसको कोई संतान नहीं थी। और उसने आत्महत्या करने की भी कोशिश की, लेकिन सफल नहीं  हो पाया, एक दिन हताश होकर जंगल की तरफ आत्महत्या करने निकल गए आत्म देव, रास्ते में उन्हें एक ऋषि मिले और फिर आत्म देव ऋषि को अपनी कहानी सुना कर रोने लगा और उपाय पूछने लगा ऋषि ने कहा मेरे पास अभी तो ऐसा कुछ नहीं की जिससे मैं तुम्हें  कुछ दे पाऊं, लेकिन आत्म देव ने बताया की उसकी गाय को कोई बच्चा नहीं हो रहा है और जब आत्म देव ऋषि को बार बार बोलने लगा तो ऋषि ने उसे एक फल दिया और उसको अपनी पत्नी को खिलाने को कहा और कहा की एक साल तक तुम्हारी पत्नी को  सात्विक जीवन जीना पड़ेगा। ब्राह्मण आत्म देव वह फल लेकर ख़ुशी ख़ुशी घर वापस आकर सारी बात धुंधली को बताता है और उसको वह फल खाने को देता है।

लेकिन धुंधली सोचती है अगर बच्चा हुआ तो उसको बहुत कष्ट का सामना करना पड़ेगा यही सोच कर उस फल को नहीं खाया और जाकर सारी बात अपने छोटी बहन को बताई तो उसकी बहन ने उसे एक रास्ता बताया और कहा की मैं गर्भवती हूँ और मुझे बालक होने वाला है तू ही लेना उसको और उस फल को गाय को खिला दे इससे उस ऋषि की शक्ति का भी पता चल जायेगा। धुंधली ने ऐसा ही किया। और अपने पति आत्म देव के सामने गर्भावस्था का नाटक करने लगी और कुछ दिन बाद  जाकर अपने बहन से बच्चा लेकर आ गयी। ब्राह्मण आत्म देव बहुत खुश हुआ और उस बच्चे का नाम ब्रह्मदेव रखना चाहा लेकिन धुंधली ने फिर झगड़ कर उसका नाम धुंधकारी रखा। और धुंधली ने जो फल गाय को खिलाया था उसके भी गर्भ से मनुष्य का बालक हुआ जिसके कान लम्बे लम्बे थे इसीलिए उसका नाम आत्म देव ने गोकर्ण रखा। 

दोनों बड़े हो गए जिसमें धुंधकारी दुष्ट व चाण्डाल प्रवृति का था तो गोकर्ण सरल स्वभाव का था। धुंधकारी सारे गलत काम करता एक दिन तो उसने अपने पिता आत्म देव की ही पिटाई कर दी। आत्म देव बहुत दुखी हुआ और अपने दुखी पिता को देख गोकर्ण उनके पास आया और उनको वैराग्य जीवन जीने के लिए कहा। और कहा की संसार में हम बस भागवत दृष्टि रखकर ही सुखी हो सकते है। गोकर्ण की बात मानकर आत्म देव गंगा के किनारे आकर भागवत के दशम स्कंध का पाठ करने लगे थे और उसी जीवन में उन्हें भगवान श्री कृष्ण की प्राप्ति हो गयी थी। 

समय बीतता गया और एक दिन धुंधली ने भी धुंधकारी के अत्याचारों को देख दुखी होकर एक कुएँ में कूद कर आत्महत्या कर ली। अब धुंधकारी एकदम ही अत्याचारी और दुष्कर्म वाला इंसान बन गया था। वह वैश्यों की मांगो के लिए चोरी करता और एक दिन तो उसने राजा के यहाँ ही चोरी कर ली,सभी वेश्याएं सोचने लगी कि अगर यह जिन्दा रहा तो एक दिन हमको भी मरवा देगा। यह सोच कर उन लोगों ने धुंधकारी को बांध कर उसको जल्ती हुई आग उसके मुख में डालकर तड़पा तड़पा कर मार डाला। बुरे प्रवृति के होने की वजह से धुंधकारी प्रेत बन गया और वह अपने भाई गोकर्ण को डराने लगा। 

हालाँकि गोकर्ण ने अपने भाई का श्राद्ध गया जाकर किया था लेकिन धुंधकारी को फिर भी मुक्ति नहीं मिली। वह गोकर्ण को डराने की कोशिश करता लेकिन गोकर्ण गायत्री मंत्र का जाप करता तो धुंधकारी उसके पास नहीं जा सकता था। गोकर्ण ने जब कहा की मैंने तो तुम्हारा पिंडदान कर दिया है फिर भी तुम प्रेत बन घूम रहे हो तो धुंधकारी ने बोला कि मैंने इतना पाप किया है पिंडदान से मेरी मुक्ति नहीं होगी। उसके बाद गोकर्ण ने सभी विद्वानों व सूर्य देवता को नमन कर इसका उपाय पूछा तो सूर्य देव ने कहा की इसको मोक्ष की प्राप्ति भागवत कथा सुनने से ही होगी।

गोकर्ण ने भागवत कथा का आयोजन किया और धुंधकारी एक बांस पर जाकर छिप कर बैठ गया वांस में सात गांठें थी वो वहीं जाकर बैठ गया। पहले दिन की कथा में पहली गांठ का भेदन हुआ ऐसे ही दूसरे दिन दूसरे में ऐसे करके सातों गांठों का भेदन हो गया। धुंधकारी दिव्य रूप धारण कर प्रकट हो गए और उनको लेने भगवान स्वयं आये। पंडित गणेश दत्त शास्त्री ने बताया कि भागवत कथा बहुत लोगों ने सुनी होगी मगर धुंधकारी को स्वयं भगवान लेने क्यों आए बहुत कम लोग जानते होंगे। इसकी वजह यह है की धुंधकारी ने पूरी श्रीमद् भागवत कथा श्रद्धा तथा प्रेम भाव से सुनी। इस मौके पर विपन शर्मा, मास्टर रजिंद्र शर्मा,नरेश कुमार, राजीव पंडित,राज कुमार शर्मा, महासचिव संसार चंद, अनमोल शर्मा, विकास शर्मा ने लोगों से श्रीमद् भागवत कथा सुनने का आग्रह भी किया है।

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