– क्या भांग और अफीम की खेती को मान्यता मिलनी चाहिए
ऊना/सुशील पंडित:अफीम की खेती उत्तर भारत को धन से नहला सकती है। यदि समाज नियमों को सख्ती से लागू करके इसकी खेती करे तो आर्थिक रूप से पिछड़ा किसान समृद्ध हो जाएगा। सोमवार को गगरेट पुलिस ने एक व्यक्ति को अफीम के 120 पौधों के साथ गिरफ्तार किया है। अफीम की खेती करना या अफीम या चूरापोस्त अथवा इसकी कलियों (डोडे) को अपने पास रखना या उसका व्यापार करना कानूनन अपराध है। पुलिस ने अंबोटा के वार्ड नंबर 6 निवासी मेहरद्दीन जोकि पेशे से ड्राइवर पुत्र वलायत अली से अफीम के 120 पौधे बरामद किए हैं। मेहरद्दीन को आरोपी बनाकर उसके ऊपर मादक द्रव्य अधिनियम की धारा 18-61-85 के तहत मामला दर्ज कर लिया है।
क्या भांग और अफीम की खेती को मान्यता मिलना चाहिए
हिमाचल सरकार को यह बात समझनी चाहिए कि जिन पदार्थों का सेवन बड़े स्तर पर हो रहा हो उसे कानूनी दायरे में लाने से काले बाजार में बिकने वाली वस्तु प्रकट रूप से अर्थव्यवस्था में शामिल हो जाती है। अफीम और भांग की खेती से राज्य को कोई नुकसान नहीं होगा। अपितु दवा उद्योग में हिमाचलियों के लिए अवसर पैदा हो जाएंगे। भांग और अफीम के पदार्थ सदियों से समाज का अभिन्न अंग रहे हैं। नीतिकारों ने अपने अपने अनुभवों के आधार पर इन दोनों पदार्थों को गैरकानूनी घोषित किया हुआ है। यदि समाज के अनुभव से निर्णय लिए होते तो बेवजह के आपराधिक मुकद्दमे, वकीलों की फीसें, कोर्ट कचहरी के खर्चे, जेलों पर बोझ, अफीम और भांग में मिलावट और इन दोनों पदार्थों के अवैध व्यापार समेत कई अनावश्यक विषयों के दुरप्रभाव से समाज बच जाता।
किसी वस्तु के निषेद से उसका व्यापार नहीं रुकता। अपितु निषेद ऐसे पदार्थों का व्यापार चंद लोगों के हाथ में चला जाता है। दो नंबर में चलने वाला व्यापार यदि एक नंबर में आ जाए तो कम से कम समाज यह तो जान पाएगा कि यह पूरा खेल आखिर चलता कैसे है। समाज को भागीदार बनाने से ही समस्या का हल होगा। अफीम और भांग के व्यापार को फिलहाल पुलिस, नेता और सिंडीकेट ही कंट्रोल करते हैं। यदि कोई साहसी सत्ता इसे खुला कर दे तो समाज से कई अपराध और समस्याएं दूर हो जाएंगी। इस विषय पर समाज को एक सार्थक बहस करनी चाहिए। सरकार एक सर्वे से इसकी शुरूआत कर सकती है।