नई दिल्लीः भारतीय शेयर बाजार में 13 मार्च को एक बार फिर बड़ी गिरावट देखने को मिली। जहां दोनों प्रमुख सूचकांक BSE Sensex और NSE Nifty लाल रंग के निशान पर खुले। सेंसेक्स शुरुआती कारोबार में करीब 600 अंक गिरकर 75500 के नीचे पहुंच गया जबकि एनएसई निफ्टी 200 अंक गिरकर 23500 के नीचे रह गया। बाजार की इस गिरावट ने निवेशकों के करोड़ों रुपये डुबो दिए हैं। अगर हम अलग-अलग सेक्टर की बात करें तो निफ्टी आईटी, ऑटो और बैंकिंग सेक्टर में सबसे ज्यादा कमजोरी देखी जा रही है। बाजार में छाई इस मायूसी के पीछे कई बड़े ग्लोबल और घरेलू कारण जिम्मेदार हैं जिनका असर सीधे तौर पर निवेशकों की जेब पर पड़ रहा है। क्रूड ऑयल की कीमतें उस समय बढ़ीं जब ईरान ने एक अमेरिकी तेल टैंकर पर हमला किया। यह उछाल तब आया जब अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) ने आपातकालीन भंडार को रिलीज करने की घोषणा की थी।
रातभर में, वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) फ्यूचर्स 9.72% बढ़कर $95.73 प्रति बैरल पर बंद हुए। जबकि शुक्रवार सुबह इसमें 1.11% की गिरावट के साथ $94.67 प्रति बैरल पर ट्रेड किया गया। ब्रेंट क्रूड फ्यूचर्स 9.22% बढ़कर $100.46 प्रति बैरल पर बंद हुए और आज सुबह 0.98% गिरकर $99.48 प्रति बैरल पर ट्रेड कर रहे थे। COMEX पर क्रूड ऑयल की कीमतों में 0.16% की गिरावट दर्ज की गई और यह $95.580 प्रति बैरल पर आ गया।
शेयर बाजार के लिए यह हफ्ता पिछले एक साल में सबसे बुरा साबित हो रहा है। इस हफ्ते अब तक मुख्य इंडेक्स में 4 पर्सेंट से ज्यादा की बड़ी गिरावट आ चुकी है। अगर गिरावट का यही दौर जारी रहा तो यह दिसंबर 2024 के बाद की सबसे बड़ी साप्ताहिक गिरावट होगी। दरअसल, जब से 28 फरवरी को ईरान पर अमेरिका और इजरायल के युद्ध की खबरें आई हैं, तब से मार्केट करीब 6.1 पर्सेंट तक नीचे गिर चुका है। युद्ध की वजह से ग्लोबल मार्केट में अनिश्चितता का माहौल है और बड़े निवेशक अपना पैसा सुरक्षित जगहों पर शिफ्ट कर रहे हैं जिससे भारतीय बाजारों पर दबाव बढ़ता जा रहा है।
बाजार के गिरने की एक बड़ी वजह विदेशी निवेशकों यानी एफआईआई की तरफ से हो रही ताबड़तोड़ बिकवाली है। मार्च के महीने में अब तक विदेशी फंड्स ने भारतीय शेयर बाजार से करीब 49 अरब डॉलर के शेयर बेच दिए हैं। यह जनवरी 2025 के बाद का सबसे बड़ा आउटफ्लो होने की संभावना है। जब विदेशी निवेशक इतनी बड़ी मात्रा में बिकवाली करते हैं, तो मार्केट में नकदी यानी लिक्विडिटी की कमी हो जाती है और शेयरों के भाव तेजी से नीचे आने लगते हैं।