नई दिल्ली: साल 2026 में नौकरी की दुनिया में कदम रखने का अर्थ है कि ऐसे माहौल में चले जाना जहां पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अब कोई खास टूल नहीं रहा बल्कि काम का बुनियादी हिस्सा बन गया है। ड्राफ्टिंग, डेटा एनालिसिस से लेकर कस्टमर एंग्जेमेंट तक एआई सिस्टम लगभग हर काम में शामिल हैं। इससे सिर्फ काम करने का तरीका नहीं बदला बल्कि करियर की शुरुआत का ढांचा भी बदल गया है। अब सवाल यहां ये नहीं है कि लगातार ऑटोमेशन के दौर में क्या रणनीति अपनाई जा सकती है।
धीरे-धीरे नहीं बदल रही चीजें
सर्वे के अनुसार, दुनिया भर के ज्यादातर कर्मचारियों को यही लगता है कि एआई उनके रोजमर्रा के काम को प्रभावित करेगा। एआई से जुड़ी स्किल्स वाली नौकरियों की भी मांग तेजी से बढ़ रही है वहीं कम जटिल और बार-बार दोहराए जाने वाले काम तेजी से मशीनों को दिए जा रहे हैं।
पीढ़ियों के बीच फर्क भी साफ दिखता है। Gen-z की नौकरी की सुरक्षा पर एआई के असर की सबसे ज्यादा चिंता है वहीं उम्रदराज कर्मचारियों को खुद को ढाल लेने पर ज्यादा भरोसा है। इसका एक कारण है समय। युवा ऐसे सिस्टम में एंट्री ले रहे हैं जो पहले से ही ऑटोमेशन के हिसाब से बदल गया है वहीं पीढ़ी ने बदलाव के साथ खुद को ढाल लिया है।
एलन मस्क ने दी युवाओं को सलाह
एलन मस्क ने युवाओं को कहा है कि मैं यही कहूंगा कि आशावादी रहो भविष्य को लेकर पॉजिटिव रहना अच्छा है। आशावादी होकर गलत होना निराशावादी होकर सही होने से बेहतर है आपकी जिंदगी की गुणवत्ता बेहतर होगी। मैं लोगों से कहूंगा कि भविष्य को लेकर एक्साइटेड रहे मैं खुद भविष्य को लेकर उत्साहित हूं। मुझे भरोसा है कि भविष्य उबाऊ नहीं होगा ज्यादा किताबें पढ़ो अलग-अलग चीजें आजमाओ जिंदगी का मजा लो लेकिन काम करना भी जिंदगी का हिस्सा है। यह सलाह ज्यादा दार्शनिक है व्यावहारिक कम लेकिन आज के युवाओं के लिए आशावाद पहले से ज्यादा चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में काम करेगा।
युवाओं के लिए कम हो रहे एंट्री प्वाइंट
एआई अपनाने का एक कम दिखाई देने वाला असर शुरुआती करियर पर भी हुआ है। पहले जो काम जूनियर कर्मचारियों को सीखने का मौका देते थे जैसे बेसिक रिपोर्टिंग, कस्टमर हैंडलिंग, रुटीन एनालिसिस, अब वे मशीनें करने लगी हैं। इससे पढ़ाईसे नौकरी तक का सफर ज्यादा अनिश्चित हो गया है। मौके मौजूद हैं लेकिन कम हैं ज्यादा स्किल की मांग करते हैं और सीखने के लिए पहले जैसे ढील नहीं देते।
आशावाद अब कोई ऑप्शन नहीं
एआई को लेकर चिंता सिर्फ नौकरी जाने की नहीं बल्कि बदलाव की रफ्तार की है। नौकरी की जरुरतें इतनी तेजी से बदलती जा रही हैं कि ट्रेनिंग सिस्टम पीछे छूट रहा है। अब एआई की समझ को सिखाया नहीं जाता मान लिया जाता है कि आपको आती है। यानी खुद को बदलने की जिम्मेदारी व्यक्ति पर आ गई है।
2026 में आशावादी रहने का अर्थ है कि आप नई स्किल्स उतनी ही तेजी से सीख पाएंगे जितनी तेजी से काम बदल रहे हैं। यह भी मानना पड़ेगा कि करियर अब सीधी रेखा में नहीं चलेगा और पारंपरिक पड़ाव कम होंगे। चिंता ज्यादा है लेकिन दूसरी ओर Gen-Z एआई टूल्स का सबसे ज्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं। कई युवा पहले से ड्राफ्टिंग, रिसर्च, कोडिंग और रोजमर्रा के काम में जनरेटिव एआई का इस्तेमाल कर रहे हैं। ये परिचय जोखिम खत्म नहीं करता है लेकिन अनजान होने का डर जरुर कम करता है। सर्वे के डेटा से यह भी पता चलता है कि चिंता के बाद भी लोग पीछे नहीं हट रहे हैं बल्कि उन्हें समझ है कि तकनीकी बदलाव अस्थायी नहीं संरचनात्मक हैं।