ऊना/सुशील पंडित: जिला ऊना के रामगढ़ वन रेंज में खैर के पेड़ों के कटान पर लगाई गई अस्थायी रोक को लेकर वन विभाग ने स्पष्ट किया है कि यह निर्णय पूरी तरह नियमों और पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखते हुए लिया गया है।जिला वनमण्डलाधिकारी सुशील राणा ने बताया कि रामगढ़ रेंज में स्टाफ की भारी कमी के चलते निगरानी व्यवस्था प्रभावित हो रही थी। वर्तमान में तीन बीटों पर मात्र एक ही वन रक्षक तैनात है, जिससे कटान प्रक्रिया की प्रभावी मॉनिटरिंग संभव नहीं हो पा रही थी। ऐसे में किसी भी प्रकार की अनियमितता या अवैध कटान की आशंका को देखते हुए एहतियातन यह कदम उठाया गया है।
उन्होंने कहा कि विभाग को कुछ गुप्त सूचनाएं भी प्राप्त हुई थीं, जिनके आधार पर जांच और सत्यापन आवश्यक हो गया था। पर्यावरण संरक्षण विभाग की प्राथमिक जिम्मेदारी है और खैर जैसे बहुमूल्य वृक्षों की सुरक्षा सुनिश्चित करना बेहद जरूरी है। वनमण्डलाधिकारी ने स्पष्ट किया कि यह रोक स्थायी नहीं है, बल्कि स्थिति सामान्य होने और पर्याप्त स्टाफ उपलब्ध होने तक अस्थायी व्यवस्था है। यदि किसान और ठेकेदार विभाग के नियमों का पूर्ण पालन करते हुए सहयोग करेंगे, तो नियमानुसार कटान की अनुमति देने में विभाग को कोई आपत्ति नहीं होगी।
उन्होंने किसानों से अपील की है कि वे धैर्य बनाए रखें और विभाग के साथ समन्वय बनाकर कार्य करें, ताकि पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय लोगों की आजीविका—दोनों के बीच संतुलन कायम रखा जा सके। वन विभाग ने भरोसा दिलाया है कि जैसे ही निगरानी व्यवस्था सुदृढ़ होगी और सभी औपचारिकताएं पूरी होंगी, कटान प्रक्रिया को पुनः सुचारु रूप से आरंभ करने पर विचार किया जाएगा।
डिपो खाली करने के आदेश
रामगढ़ धार फॉरेस्ट रेंज में लकड़ी भंडारण स्थलों (डिपो) को खाली करने के निर्देश भी जारी किए गए हैं। डीएफओ कार्यालय की ओर से जारी अधिसूचना के अनुसार कार्य कर रहे सभी ठेकेदारों को 3 मार्च तक अपने अस्थायी डिपो खाली करने को कहा गया है। विभाग द्वारा लिए गए इस निर्णय के बाद 10 वर्षीय खैर कटान कार्यक्रम पर भी तत्काल प्रभाव से विराम लग गया है। आदेश में यह भी उल्लेख किया गया है कि विभाग को लंबे समय से विभिन्न स्तरों पर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा था।
अचानक लिए गए इस फैसले से यह चर्चा भी तेज हो गई है कि क्या केवल कार्यभार का दबाव कारण है या इसके पीछे अन्य प्रशासनिक और संरक्षण से जुड़े मुद्दे भी हैं।फिलहाल विभाग के इस निर्णय से संबंधित ठेकेदारों में चिंता और रोष देखा जा रहा है, जबकि वन संरक्षण के दृष्टिकोण से इसे सख्त लेकिन आवश्यक कदम माना जा रहा है।