नई दिल्ली: वॉशिंगटन में कॉलेजिएट खेलों पर आयोजित एक राउंड टेबल कार्यक्रम के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने नाटो सहयोगियों को चेतावनी दे दी है। उनका कहना है कि यदि वे होर्मुज स्ट्रेट को फिर से खोलने और सुरक्षित बनाने में मदद नहीं करते तो नाटो का भविष्य बहुत बुरा हो सकता है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप ने संकेत दिया है कि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ प्रस्तावित शिखर बैठक को टाला जा सकता है क्योंकि बीजिंग की भूमिका इस संकट में साफ नहीं है। चीन अपनी ऊर्जा जरुरतों के लिए इस जलमार्ग पर निर्भर है इसलिए उसे भी इसकी सुरक्षा में योगदान देना चाहिए।
ट्रंप ने फ्रांस, जापान, दक्षिण कोरिया और ब्रिटेन सहित कई देशों से युद्धपोत भेजने की अपील की है ताकि ईरान हमलों के बीच वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति बाधित न हो। उन्होंने यह भी चेतावनी दी है कि यदि जरुरत पड़ी तो अमेरिका ईरान के प्रमुख तेल निर्यात केंद्र खर्ग द्वीप पर अतिरिक्त सैन्य कार्रवाई कर सकता है। इन बयानों से यह साफ है कि अमेरिका इस संघर्ष को सिर्फ सैन्य ही नहीं बल्कि व्यापक कूटनीतिक दबाव के जरिए से भी नियंत्रित करने की कोशिश कर रहा है।
ट्रंप को नहीं मिल रहा कोई समर्थन
रिपोर्ट्स के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ये आक्रामक रुख घरेलू राजनीतिक संकट और गहरा कर रहा है। ईरान युद्ध को लेकर ट्रंप को अमेरिका में भी समर्थन नहीं मिल रहा है। सर्वेक्षणों में साफ रुप से दिख रहा है। अमेरिकी समाज इस संघर्ष को लेकर विभाजित है और समय के साथ यह विरोध और मजबूत हो सकता है। युद्ध की शुरुआत में ट्रंप प्रशासन ने अचानक सैन्य कार्रवाई को प्राथमिकता दी और जनमत प्रक्रिया को नजरअंदाज किया। अमेरिकी राजनीति में यह परंपरा रही है कि युद्ध से पहले जनता को इसके औचित्य और संभावित प्रभावों के बारे में तैयार किया जाता है। इस परंपरा की अनदेखी के कारण ट्रंप अब घरेलू स्तर पर वैधता के संकट का सामना कर रहे हैं।
ट्रंप प्रशासन ने युद्ध शुरु होने के बाद ईरान को तत्कालिक खतरा बताने की कोशिश की लेकिन यह तर्क व्यापक रुप से प्रभावी नहीं रहा। इसके विपरीत विदेश मंत्री और रक्षा मंत्री के बयानों ने युद्ध को वैचारिक और भावनात्मक स्तर पर और विवादित बना दिया। खासतौर पर जब सैन्य कार्रवाईयों में नागरिक हताहतों की खबरें सामने आई। तब युद्ध के बाधा के कारण वैश्विक तेल बाजार में अस्थिरता बढ़ गई है। इससे ऊर्जा और उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी हुई है। अमेरिकी मतदाता आमतौर पर आर्थिक संकेतकों से ज्यादा अपने रोजमर्रा के खर्च के आधार पर सरकार का मूल्यांकन करते हैं। ऐसे में बढ़ती मंहगाई और आर्थिक अनिश्चितता ट्रंप की लोकप्रियता को कमजोर कर रही है।
ट्रंप की समस्या यह भी है कि उन्होंने अपने समर्थकों को युद्ध की संभावित लागत और दीर्घकालिक प्रभावों के लिए तैयार नहीं किया। तेज और निर्णायक जीत के वादे राजनीतिक रुप से आकर्षक हो सकते हैं लेकिन वास्तविकता अक्सर ज्यादा मुश्किल होती है। ईरान की रणनीति अमेरिकी और उसके आस-पास के देशों की आर्थिक और राजनीतिक कमजोरियों को निशाना बनाकर इस युद्ध को लंबा खींचने की प्रतीत होती है।
नाटो और अन्य साथी देशों के साथ बढ़ेगा मतभेद
कूटनीतिक स्तर पर साथियों का बढ़ता दबाव यह संकेत देता है कि अमेरिका अकेले इस संघर्ष को संभालने में कठिनाई महसूस होती है। नाटो और अन्य साथी देशों में के साथ बढ़ते मतभेद अमेरिकी विदेश नीति की विश्वसनीयता को प्रभावित कर सकते हैं। मध्यावधि चुनावों के करीब आते ही यह संकट राजनीतिक रुप से और महत्वपूर्ण हो सकता है। रिपब्लिकिन पार्टी के अंदर भले ही सार्वजनिक विरोध सीमित हो लेकिन चुनावी जोखिम को देखते हुए कई नेता युद्ध को जल्दी खत्म करने की मांग कर सकते हैं।
ट्रंप के लिए संघर्ष सिर्फ युद्धभूमि तक सीमित नहीं है। यह अमेरिकी जनमत, अर्थव्यवस्था और वैश्विक कूटनीति के जटिल समीकरणों में भी लड़ा जा रहा है। यही कारण है कि ईरान के खिलाफ यह युद्ध, सैन्य दृष्टि से चाहे जैसा भी हो। घरेलू मोर्चे पर ट्रंप के नेतृत्व की सबसे बड़ी परीक्षा बनता जा रहा है।