चंडीगढ़: मिडिल ईस्ट में इजरायल, अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव का असर कच्चे तेल की कीमतों पर दिखने लगा है। इजरायल-अमेरिका का ईरान पर हमले के बाद कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आया है। इससे पहले सोना चांदी की कीमतों में भी उछाल देखने को मिला था। हॉर्मूज स्ट्रेट बंद होने से सप्लाई बुरी तरह प्रभावित होने की आशंका है। इंट्रा-डे में ब्रेंट क्रूड का भाव करीब 12 फीसदी बढ़कर 81 डॉलर प्रति बैरल के पार हो गई। अब 5 फीसदी की तेजी के साथ 76 डॉलर प्रति बैरल के पास ट्रेड कर रहा है। क्रूड ऑयल की कीमतों में बढ़ोतरी का असर भारतीय कंपनियों पर पड़ेगा।
अमेरिका-ईरान युद्ध की वजह से हॉर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने की आंशका हो गई है। इसी रूट से भारत के कच्चे तेल का लगभग आधा हिस्सा आता है। अगर यह रास्ता बंद हो जाता है तो क्रूड स्पलाई बुरी तरह प्रभावित होगी। जानकारों का मानना है कि अगर यह तनाव और बढ़ा, तो तेल की कीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल तक सकती हैं। इसका असर भारत में पेट्रोल-डीजल पर दिख सकता है। दिल्ली में पेट्रोल 95 रुपए लीटर से बढ़कर 100 रुपए तक पहुंच सकता है। वहीं डीजल 88 रुपए से बढ़कर 92 रुपए तक जा सकता है।
1 से 18 फरवरी के बीच भारत का औसत कच्चा तेल आयात 4.85 मिलियन बैरल प्रतिदिन रहा। रूस से सप्लाई घटने के बाद भारत ने मिडिल ईस्ट से खरीद बढ़ाई थी। फरवरी में सऊदी अरब से आयात 1 से 1.1 मिलियन बैरल प्रतिदिन तक पहुंचने का अनुमान है, जो अप्रैल 2020 के बाद सबसे ज्यादा है। ऐसे में मिडिल ईस्ट में अस्थिरता भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए जोखिम बन सकती है। ICRA का कहना है कि भारतीय रिफाइनर अमेरिका, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका से तेल मंगा सकते हैं। लेकिन अगर कीमतें ऊंची रहीं तो आयात बिल बढ़ेगा और चालू खाते पर दबाव आएगा।
Equirus Securities के मुताबिक, पिछले 50 वर्षों में भू-राजनीतिक संकटों के दौरान तेल की कीमतें 25 से 300 प्रतिशत तक उछली हैं, चाहे सप्लाई बाधा अस्थायी ही क्यों न रही हो। पैटर्न लगभग एक जैसा रहा है। पहले कीमतें तेजी से चढ़ती हैं, उनमें जोखिम प्रीमियम जुड़ता है, फिर समय के साथ सप्लाई रूट बदलते हैं और कीमतें धीरे-धीरे सामान्य होती हैं। असली सवाल यह नहीं कि कीमतें उछलेंगी या नहीं, बल्कि यह है कि यह उछाल कितने समय तक टिकेगा।