ऊना/सुशील पंडित: ऊना के डीसी जतिन लाल के सरकारी आवास की क्यारी में प्राकृतिक खेती से उगी सब्जियों के साथ एक सशक्त संदेश भी अंकुरित हुआ है। यह संदेश है…नीतियों को काग़ज़ से निकालकर ज़मीन तक पहुंचाने का और बदलाव की शुरुआत स्वयं से करने का। जतिन लाल ने अपने निजी उदाहरण से हिमाचल प्रदेश में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने की मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंद्र सिंह सुक्खू की सोच को केवल अमल में ही नहीं उतारा बल्कि उसे अपने घर की मिट्टी में बोकर एक सजीव मिसाल में बदल दिया है।

उपायुक्त ने अपने आवास परिसर में गोबी, चुकंदर, टमाटर, मूली, प्याज़, शलगम, लहसुन, हरा धनिया, आलू सहित अनेक सब्जियां पूरी तरह प्राकृतिक विधि से उगाई हैं। यहां मिट्टी में बसी ताजगी और क्यारियों से उठती सौंधी खुशबू यह एहसास दिलाती है कि यह पहल केवल व्यक्तिगत प्रयोग भर नहीं है बल्कि प्रशासनिक नेतृत्व के माध्यम से समाज को दिशा देने का एक प्रेरक प्रयास भी है।
जतिन लाल का कहना है कि स्वस्थ जीवनशैली की असली शुरुआत थाली से होती है और ज़हर-मुक्त खेती इसका सबसे बेहतर विकल्प है। प्राकृतिक खेती से उगा भोजन स्वास्थ्य के लिए बेहतर होने के साथ स्वाद में भी कहीं अधिक समृद्ध होता है और यही इसकी सबसे बड़ी ताक़त है। आज इस खेती पद्धति को जीवनशैली की तरह अपनाने और एक जनआंदोलन की तरह बढ़ाने की ज़रूरत है। एक क्यारी से उठी यह कहानी, हाल के वर्षों में किसानों के अपने खेतों को ज़हरमुक्त बनाने की कोशिशों से जुड़ती चली जाती है।
प्राकृतिक खेती की ओर अग्रसर हिमाचल
उल्लेखनीय है कि बीते कुछ वर्षों में ठाकुर सुखविंद्र सिंह सुक्खू के कुशल नेतृत्व में हिमाचल प्रदेश में बड़ी संख्या में किसान और बागवान रसायन-मुक्त खेती की ओर आकर्षित हुए हैं। ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने और किसानों को आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से प्रदेश सरकार द्वारा लिए गए दूरदर्शी निर्णयों के सकारात्मक परिणाम अब स्पष्ट रूप से सामने आ रहे हैं। राज्य सरकार ने किसानों को अतिरिक्त आय के अवसर, उपज के वाजिब दाम, गुणवत्तापूर्ण बीज, सिंचाई सुविधाओं का विस्तार, फसल बीमा, प्रशिक्षण और अनुसंधान जैसी सभी आवश्यक व्यवस्थाओं पर विशेष ध्यान दिया है।
प्राकृतिक खेती का मजबूत मॉडल बनकर उभर रहा ऊना जिला, 14,240 ने अपनाई प्राकृतिक खेती
आत्मा परियोजना निदेशक, ऊना प्यारो देवी ने बताया कि ऊना जिला में 1907 हेक्टेयर भूमि पर प्राकृतिक खेती की जा रही है। जिले के 48,006 किसानों में से 14,240 किसान प्रशिक्षण लेकर इस पद्धति से जुड़ चुके हैं और अपनी आजीविका सुदृढ़ कर रहे हैं।
उन्होंने बताया कि किसानों को प्राकृतिक खेती के प्रति प्रोत्साहित करने के लिए राज्य सरकार द्वारा उन्हें विभिन्न प्रकार के अनुदान भी दे रही है। प्राकृतिक खेती करने वाले किसानों को गौशाला का फर्श पक्का करने और गौमूत्र हेतू गड्ढा बनाने के लिए 8 हजार रुपये तथा ड्रम खरीद पर 750 रुपये प्रति ड्रम के तौर पर अधिकतम 2250 रुपये अनुदान का प्रावधान है। इसके साथ ही, भारतीय नस्ल की गाय की खरीद पर 50 प्रतिशत या अधिकतम 25000 रुपये अनुदान दिया जा रहा है। गाय के परिवहन के लिए 5 हजार रुपये की अतिरिक्त धनराशि का भी प्रावधान है।
गेहूं, मक्की और हल्दी फसलों के एमएसपी निर्धारण के निर्णायक फैसले
प्यारो देवी ने बताया कि प्रदेश सरकार ने प्राकृतिक खेती से उगाई गई फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित करके किसानों को सीधे तौर पर लाभ पहुंचाया है। सरकार ने प्राकृतिक गेहूं का 60 रुपये प्रति किलो और मक्की 40 रुपये प्रति किलो का न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित किया है। साथ ही किसानों को 2 रुपये प्रति किलो के हिसाब से परिवहन भत्ता भी दिया जा रहा है। उन्होंने बताया कि हिम भोग ब्रांड के तहत प्राकृतिक मक्की का आटा बाजार में उतारकर उचित मूल्य की दुकानों के माध्यम से आमजन तक पहुंचाया जा रहा है, जिससे किसानों को सुनिश्चित बाजार और उपभोक्ताओं को स्वास्थ्यवर्धक खाद्य विकल्प मिल रहे हैं।
इसके अलावा किसानों की सकारात्मक प्रतिक्रिया से प्रेरित होकर सरकार ने प्राकृतिक खेती से उगाई गई कच्ची हल्दी पर भी समर्थन मूल्य तय किया है। इस वित्त वर्ष से प्राकृतिक कच्ची हल्दी पर 90 रुपये प्रति किलो का एमएसपी प्रदान किया जा रहा है, जिसे ‘हिमाचल हल्दी’ ब्रांड के नाम से बाजार में उतारा जाएगा।
उपायुक्त जतिन लाल ने हुए कहा कि ज़िला प्रशासन मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू के निर्देशानुसार किसानों को प्राकृतिक खेती को लेकर तकनीकी मार्गदर्शन, प्रशिक्षण और वित्तीय सहायता उपलब्ध करवा रहा है। इस खेती की सबसे बड़ी विशेषता इसका शून्य लागत मॉडल है, जिससे आय में वृद्धि के साथ-साथ भूमि की उर्वरता भी बनी रहती। उन्होंने लोगों को ज्यादा से ज्यादा संख्या में प्राकृतिक खेती अपनाने की अपील की।
