ऊना /सुशील पंडित: उपमंडल बंगाणा के अंतर्गत आती ग्राम पंचायत लठियाणी के गांव नलूट में श्रीमद्भभागवत कथा के तीसरे दिन श्रद्धालु भक्ति के सागर में गोते लगाते नजर आए। प्रख्यात कथा व्यास आचार्य पंकज शास्त्री जी ने अपनी ओजस्वी वाणी से भगवान के विभिन्न स्वरूपों और उनके भक्तों की अनन्य निष्ठा का सजीव चित्रण किया।
मोह का त्याग और जड़ भरत चरित्र
कथा की शुरुआत करते हुए आचार्य जी ने ‘जड़ भरत’ के प्रसंग पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि कैसे राजा भरत, जो सर्वगुण संपन्न थे, एक हिरण के मोह के कारण अपने पथ से विचलित हो गए और उन्हें अगला जन्म हिरण का लेना पड़ा।
आचार्य जी ने समझाया कि “अंतिम मति सो गति”। जीवन के अंतिम क्षणों में हमारा मन जहाँ अटका होता है, वैसी ही गति जीव को प्राप्त होती है। इसलिए सदैव परमात्मा का सिमरन करना चाहिए। जड़ भरत का जीवन हमें सिखाता है कि मोह बंधन का कारण है और ज्ञान ही मुक्ति का मार्ग।
भक्त प्रह्लाद की रक्षा और नृसिंह अवतार
कथा के उत्तरार्ध में भगवान नृसिंह के प्राकट्य का प्रसंग सुनाया गया, जिसे सुनकर पांडाल ‘नरसिंह भगवान की जय’ के जयकारों से गूँज उठा। आचार्य पंकज शास्त्री ने बताया कि जब-जब पृथ्वी पर अधर्म बढ़ता है और भक्तों पर संकट आता है, तब-तब प्रभु किसी न किसी रूप में अवतरित होते हैं।
प्रह्लाद की भक्ति: हिरण्यकश्यप के अहंकार और प्रह्लाद की अटूट श्रद्धा का वर्णन करते हुए उन्होंने कहा कि भगवान खंभे में भी हैं और कण-कण में भी। नृसिंह रूप: हिरण्यकश्यप के वध और प्रह्लाद की रक्षा के लिए भगवान ने आधा नर और आधा सिंह का अवतार लेकर अधर्म का नाश किया।
भक्ति और संस्कार पर जोर
आचार्य जी ने उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए कहा कि आज की युवा पीढ़ी को प्रह्लाद जैसे संस्कारों की आवश्यकता है। भक्ति केवल वृद्धवस्था के लिए नहीं, बल्कि बचपन से ही आत्मसात करने की कला है। कथा के दौरान भजनों पर श्रद्धालु भाव-विभोर होकर झूमने लगे। मुख्य यजमान [यजमान का नाम] द्वारा आरती के पश्चात प्रसाद वितरण किया गया। इस अवसर पर कथा आयोजक कांता देवी, अनीता देवी बेबी सोनू,राजेश, मिंटू सोनू के अलावा सदस्य और बड़ी संख्या में गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।
