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भागवत कर्म प्यार का शास्त्र है, भागवत कथा सुनने से ही होता है कर्तव्यों का बोध: भागवत शरण जी महाराज

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बोले, भक्त को अपनी भक्ति व भगवान पर विश्वास रखना चाहिए
ऊना/सुशील पंडित: देवभूमि हिमाचल प्रदेश के जिला ऊना की ग्राम पंचायत बदोली में चल रही श्रीमद्भागवत कथा में सुप्रसिद्ध कथावाचक आचार्य भागवत शरण जी महाराज ने अपने मुखारविंद से प्रवचनों की बौछार करते हुए कहा कि बिना भाव के भगवान कीमती से कीमती चीजों को भी ग्रहण नहीं करते। यदि हम भाव से भगवान को एक फूल ही चढ़ा दें तो प्रभु प्रसन्न हो जाते हैं और जिस व्यक्ति में ईश्वर प्रेम का भाव पैदा हो जाए, तो उसे ईश्वर की लग्न लगी रहती है। उन्होंने श्रीकृष्ण जन्म लीला, पूतना वध, गोवर्धन पूजा, माखन चोरी व चीर हरण लीलाओं का वर्णन बड़े ही सहज विस्तार से सैंकड़ों की तादात में बैठे श्रद्धालुओं को समझाया। आचार्य भागवत शरण जी ने श्रीकृष्ण जन्म की कथा विस्तार से सुनाते हुए बताया कि जब श्रीकृष्ण के पैदा होने की खबर राजा कंस को मिली, तो वह कारागार में पहुंचा। वहां कन्या को देखकर पत्थर पर पटक कर मारना चाहा तो कन्या हाथ से छूट कर यह कहते हुए आकाश में चली गई कि तेरा मारने वाला ब्रज में पैदा हो चुका है। इसके बाद वह राक्षसों को ब्रज भेजता है, किंतु वे कृष्ण का कुछ नहीं कर पाते हैं।

इसके अलावा उन्होंने श्रीकृष्ण की माखन लीला, गोवर्धन लीला व बाल लीलाओं के दृश्यों का संजीव चित्रण किया गया। उन्होंने भगवान श्री कृष्ण की बाल लीला का वर्णन करते हुए बताया कि कृष्ण के पैदा होने के बाद कंस उनको मौत के घाट उतारने के लिए अपने राज्य की सर्वाधिक बलवान राक्षस पूतना को भेजता है। पूतना वेष बदलकर भगवान श्री कृष्ण को अपने स्तन से जहरीला दूध पिलाने का प्रयास करती है, लेकिन भगवान श्री कृष्ण उसको मौत के घाट उतार देते हैं। उसके बाद कार्तिक माह में ब्रजवासी भगवान इन्द्र को प्रसन्न करने के लिए पूजन का कार्यक्रम करने की तैयारी करते हैं। भगवान कृष्ण उनको भगवान इन्द्र की पूजा करने से मना करते हुए गोवर्धन महाराज की पूजा करने की बात कहते हैं। इन्द्र भगवान उन बातों को सुनकर क्रोधित हो जाते हैं। वह अपने क्रोध से भारी वर्षा करते हैं।

जिसको देखकर समस्त ब्रजवासी परेशान हो जाते हैं। भारी वर्षा को देख भगवान श्री कृष्ण गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठा अंगुली पर उठाकर पूरे नगरवासियों को पर्वत के नीचे बुला लेते हैं। जिससे हार कर इन्द्र एक सप्ताह के बाद बारिश को बंद कर देते हैं। इस दौरान आचार्य भागवत शरण जी ने सैंकड़ो की संख्या में उमड़े श्रद्धालुओं को भक्ति रस में रंग दिया। उन्होने भगवान श्री कृष्ण की रास लीलाओं का वर्णन करते हुए श्री कृष्ण और गोपियों के मधुर मिलन और उनके श्री कृष्ण के प्रति स्नेह को विस्तार से श्रद्धालुओं को बताया। उन्होने बताया कि भगवान की प्रथा और संतो के मिलने से ही प्रभु भक्ति की धारा उत्पन्न होती है और वह समय इतना अनमोल होता है कि भगवान भी इसकी कीमत नहीं चुका सकते। उन्होंने बताया कि भगवान की भक्ति करने का एकमात्र यही रास्ता है कि हम कथा सुनने के माध्यम से ही भगवान के साक्षात दर्शन कर सकते हैं।

उन्होने बताया कि भगवान श्री कृष्ण ने अपनी माया से किस प्रकार कामदेव को भी परास्त कर दिया था, क्योंकि कामदेव गोपियों को पाना चाहते थे लेकिन श्री कृष्ण ने कामदेव को भी युद्ध करने तक चुनौती दे दी थी। और गोपियां श्री कृष्ण का रसपान करती थी। उन्होने कहा कि भागवत गीता हमें कर्मशील ही नहीं बनाती, अपितु हमें जीवन और सृष्टि के सार का भी बोध करवाती है। उन्होंने कहा कि गीता कर्म एक प्यार का शास्त्र है। गीता कभी यह नहीं कहती कि काम छोड़ कर मुझे पढ़ो। बल्कि गीता पड़ने से ही कर्तव्यों का बोध होता है और कर्तव्य परायणता में भी निखार आता है। उन्होंने कहा कि हमें कभी भी घमंड नहीं करना चाहिए, यह भी गीता ही हमें सिखाती है। क्योंकि इस संसार में पूरा जीवन घमंड में बिताने वालों को भी अंत समय में अपनी सोच बदलनी पड़ती है। जिन नश्वर चीजों को लेकर हम घमंड करते हैं, वह सभी यहीं रह जाती हैं। खाली हाथ संसार में आने वाले व्यक्ति खाली हाथ ही तो जाना होता है। उन्होंने कहा कि श्रीमद् भागवत कथा ही मनुष्य को इस दुखी संसार व अधंकारी जीवन से मुक्ति दिलाती है।

इसलिए इस मानव रूपी नश्वर जीवन में श्रीमद् भागवत कथा का श्रवण बहुत जरूरी है। उन्होंने द्रोपदी का प्रसंग सुनाते कहा कि भक्त के ऊपर जब भी कष्ट आते हैं, तब भगवान न तो व्यवस्था देखते हैं और न ही अवस्था। उन्होंने कहा कि प्रभु श्री कृष्ण ने द्रोपदी चीरहरण के दौरान साड़ी़ बनकर अपनी प्रिय भक्त की लाज बचाई थी। उसी प्रकार भगवान किसी न किसी रूप में अपने प्रिय भक्तों की मदद करते हैं। भक्त को अपनी भक्ति व भगवान पर विश्वास रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि समझदार उसे कहते है, जो दूसरों की गलती से सीख लें। जबकि समय ऐसा है कि आधुनिक युग के लोग दुर्योधन के नक्श-ए-कदम पर चलते हैं, जो आगे चलकर विनाश का कारण ही बनते रहे हैं।

उन्होंने कहा कि मन को यदि अपने प्राकृतिक रूप में रहने दिया जाए, तो उसकी कल्पनाएं अनगढ़ एवं अनियंत्रित होती हैं। मनुष्य कभी भी कुछ भी सोच सकता है, कभी यह, कभी वह, कल्पना की उड़ानों में ऐसी बातें भी सम्मिलित रहती हैं, जिनकी कोई सार्थकता नहीं होती। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति प्रभु की शरण में जाता है, भगवान उसका बेड़ा पार लगा देते हैं। प्रभु का नाम लेने से सब पाप धुल जाते हैं। इस दौरान उन्होंने हरे कृष्ण, हरे कृष्णा, कृष्णा-कृष्णा हरे हरे, हरे राम, हरे रामा, राम- राम हरे हरे हरे आदि भजन सुनाकर श्रधालुओं को भगवान के नाम का जाप करवाया।

 

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