ऊना/सुशील पंडित: कैसे विकट परिस्थितियों में सनराईज संस्था के प्रतिनिधि स्लम क्षेत्र में प्रवासियों को एकीकृत स्वास्थ्य जागरुता जांच-उपचार कार्यक्रम का आयोजन करते हैं, इसपर आधारिक गणतंत्र दिवस के अवसर पर अपनी जिम्मेदारी का निर्वाहन कैसे करती है यह झांकी में दिखाया गया है।

सनराईज संस्था 76वें गणतन्त्र दिवस के उपलक्ष्य पर प्रवासियों में पाए जाने वाली संवेदनशील बीमारियों की रोकथाम के लिए एकीकृत स्वास्थ्य जागरुता -जाँच-उपचार कार्यक्रम में संस्था के स्वयं सेवियों द्वारा किस ढ़ग से विपरीत परिस्थिीतियों में स्वास्थ्य विभाग द्वारा पोषित कार्यक्रम के माध्यम से उनकी जाच करते हैं । उक्त झांकी जिला ऊना में प्रवासियों के रहन सहन व उन में पाई जाने वाली संवेदनशील बीमारियों को दर्शाने वाली झांकी निकलकर एक अनूठी पहल कर रही है। स्लम क्षेत्र में संस्था के प्रतिनिधि किस तरह अपनी जान जोखिम में डाल कर उनके उपचार के लिए जागरुक व प्रेरित करते हैं। संस्था कोरोना काल से अब तक स्लम क्षेत्र में स्वास्थ्य विभाग व जिला प्रशासन के माध्यम से सरकार की योजनाओं को बेहतर तरीके से अमलीजामा पहना रही है। अब तक लगभग एक सौ के करीब संवेदनशील बीमारियों से ग्रस्त प्रवासियों को इलाज उनकी दहलीज पर पहुंचकर उनको स्वास्थ्य लाभ दिलवा चुकी है ।
ऊना। बाहरी राज्यों के प्रवासी समुदाय जिनमें मेहनत मजदूरी करने वाले अधिकांश लोग शामिल हैं, जिनकी झुग्गी-झोपड़ियाँ भी एक समाज का हिस्सा हैं । ऐसी मलिन (स्लम) बस्तियां स्वास्थ्य समस्याओं का एक अलग समूह पैदा करती हैं। वर्तमान में ऊना जिले की बात करें तो यहां झुग्गी झोंपड़ियों के सैकड़ों समूह (बस्तियों) में हजारों की संख्या में लोग रहते हैं। यह उपेक्षित आबादी स्वास्थ्य संबंधी कई तरह की समस्याओं का एक बड़ा स्रोत बन चुकी थी, जिसके चलते औपचारिक स्वास्थ्य क्षेत्र को निपटना चुनौती से कम नहीं था। स्वास्थ्य और स्वच्छता विषयों की ऐसी स्लम बस्तियों के लोगों को जानकारी का अभाव और कई अन्य कारण हैं जिससे वे स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित रहते हैं।
जरूरत थी कि ऐसी स्लम बस्तियों तक भी स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध हो और ऐसे लोग स्वास्थ्य के प्रति शिक्षित अथवा जागरुक हो सकें। ऐसे समय में ऊना जिले की राज्य में सामाजिक सरोकारों पर कार्य करने वाली सनराइज संस्था ऐसे लोगों के जीवन में नया उजाला लेकर पहुंची है। इस संस्था ने न केवल स्लम (मलिन) बस्तियों में लोगों को स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता करने का बीड़ा उठाया, बल्कि उन्हें स्वास्थ्य और स्वच्छता के प्रति अलख जगाई है। विकट परिस्थितियों में ऐसे क्षेत्रों में संस्था के लोग जरूरतमंद लोगों को अस्पताल तक पहुंचाकर उनका उपचार कराने अथवा उन तक दवा पहुंचाकर सेवा कर रहे हैं।
सैंकड़ों लोगों को स्वास्थ्य सुविधाओं से जोड़कर उनके जीवन स्तर को सुधारा है। देखा गया है कि आम आबादी के साथ जो होता है, उसके विपरीत, औपचारिक स्वास्थ्य क्षेत्र को झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाली आबादी की स्वास्थ्य समस्याओं के बारे में उनकी बीमारियों के दौरान अपेक्षाकृत देर से पता चलता है। इस प्रकार, औपचारिक स्वास्थ्य क्षेत्र अनिवार्य रूप से इन बीमारियों की गंभीर और अंतिम चरण की जटिलताओं से निपटता है, जो गैर-झुग्गी समुदाय की आबादी के प्रबंधन की लागत से काफी अधिक है। झुग्गी बस्तियों की अनौपचारिक प्रकृति और झुग्गी-झोपड़ियों की आबादी के लिए अद्वितीय सांस्कृतिक, सामाजिक और व्यवहार संबंधी कारकों के कारण, इन समुदायों में बीमारियों के स्पेक्ट्रम, बोझ और निर्धारकों के बारे में बहुत कम जानकारी है जो इन जटिलताओं को जन्म देते हैं, खासकर उन बीमारियों के बारे में जो पुरानी हैं लेकिन रोकथाम योग्य हैं।
वैसी भी विश्व की सबसे बड़ी जनसंख्या वाले देश भारत में स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच अभी भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। यद्यपि पिछले कुछ दशकों में इसमें काफी सुधार हुआ है, लेकिन अभी भी इस क्षेत्र में और अधिक काम करने की आवश्यकता है। इसके बावजूद न केवल ग्रामीण, बल्कि शहरी क्षेत्रों में आबाद स्लम बस्तियों के लोगों को भी स्वास्थ्य की समुचित सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं। शहर के कुछ हिस्से ऐसे भी हैं जहां बुनियादी सुविधाओं का अभाव है, यहां रहने वाले समुदायों को स्वास्थ्य, शिक्षा, पीने का साफ पानी और अन्य बुनियादी सुविधाओं तक पहुंचने में कई प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। यहां न तो स्वास्थ्य केंद्र है और न ही डॉक्टरों या नर्सों की सुविधा उपलब्ध है। प्रसव, टीकाकरण और अन्य चिकित्सा आवश्यकताओं की देखभाल के लिए भी कोई विशेष व्यवस्था नहीं है।
परिणामस्वरूप, यहां गर्भवती महिलाओं और जन्म लेने वाले बच्चों की मृत्यु दर अधिक है। अब तक अध्ययन बताते हैं कि यहां रहने वाले अधिकांश परिवारों को पीने का साफ़ पानी भी नहीं मिल पाता है। अक्सर दूषित जल पीने के कारण बच्चे बीमार हो जाते हैं, लेकिन किसी प्रकार का पहचान पत्र नहीं होने के कारण उनका सरकारी अस्पताल में इलाज भी नहीं हो पाता है, वहीं आर्थिक रूप से कमज़ोर होने के कारण माता-पिता उन बच्चों का इलाज किसी निजी अस्पताल में कराने में सक्षम नहीं होते हैं। इस बस्ती में मलेरिया, दस्त और सांस संबंधी बीमारियां आम हैं क्योंकि यहां के लोग गंदगी और कचरे के बीच रहने को मजबूर हैं।
प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल सिद्धांतों को लागू करने में सबसे बड़ी चुनौती सभी को स्वास्थ्य देखभाल का समान वितरण करना है। ग्रामीण जनता और शहरी झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले लोग स्वास्थ्य देखभाल तक पहुँच की कमी के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील हैं। यह संस्था जिले में अब स्वास्थ्य विभाग और सरकार के सहयोग से ऐसी बस्तियों को चिन्हित करके उन तक सरकार की स्वास्थ्य सुविधाओं को पहुंचा रही है और जो लोग अस्पताल तक नहीं पहुंच पा रहे थे उनको जागरूक करके स्वास्थ्य लाभ दिला रही है। संस्था के इस नेक कार्य से स्लम बस्तियों के सैकड़ों लोगों का समय पर उपचार संभव हो पा रहा है। देखने में आया कि ऐसी स्लम बस्तियों के लोग खराब आवास और अस्वास्थ्यकर स्थितियों में रह रहे थे। संचारी रोगों और कुपोषण (विशेष रूप से बच्चों में) के बोझ के अलावा कुछ वयस्कों में उच्च बॉडी मास इंडेक्स द्वारा प्रमाणित जीवनशैली रोगों का खतरा पाया गया।
प्रभावी स्वास्थ्य सेवा के अत्यधिक कम उपयोग के कारण, अज्ञानता वश गरीब समुदायों में स्वास्थ्य लाभ नहीं मिल पाते हैं। एक और चिंता यह थी कि सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं का उपयोग उन गरीबों में सबसे कम है, जिन्हें इसकी सबसे ज्यादा जरूरत होती है। इन तेजी से उभरती चुनौतियों का सामना करने के लिए, स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच और आबादी द्वारा उनका उपयोग आवश्यक था। ग्रामीण क्षेत्रों और शहरी मलिन बस्तियों में स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच का रिकॉर्ड बहुत खराब रहा है। ऐसे में सरकार ने पहल की और उसका हिस्सा सनराइज संस्था भी बन चुकी है। इस संस्था ने अब ऊना जिले से ऐसी बस्तियों में पहचान करके उन तक स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर पहुंच बनाई है। कठिन चुनौती को इस संस्था के स्वयं सेवक दृढ़ संकल्प लेकर आसानी से पूरा कर रहे हैं।
