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संसार के सभी ग्रंथों का सार व योगशास्त्र है श्रीमद्भागवत कथा, झंंबर में बोले कथा वाचक तरुण डोगरा

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ऊना/सुशील पंडित: देवभूमि हिमाचल प्रदेश के जिला ऊना उपमंडल के तहत पढ़ती ग्राम पंचायत झंंबर में चल रही एक अप्रैल से 7 अप्रैल तक श्रीमद् भागवत ज्ञान गंगा के दूसरे दिन क्षेत्र के सुप्रसिद्ध कथा वाचक आचार्य तरुण डोगरा ने अपने मुखारविंद से प्रवचनों की वर्षा करते हुए कहा कि श्रीमद्भगवत कथा संसार के सभी ग्रंथों का सार व योगशास्त्र है, क्योंकि प्राचीन काल से ही योग का अस्तित्व देखा जा सकता है, इसका प्रत्यक्ष प्रमाण श्रीमद्भागवत कथा ही है, जो सभी ग्रंथों में सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण द्वारा रचित इसमें व्यक्ति के जीवन का मूल सार है और इस ग्रंथ में महाभारत काल से लेकर द्वापर तक श्री कृष्ण की सभी लीलाओं का वर्णन किया गया है।

तरूण डोगरा महाराज ने बताया कि भागवत कथा में पहली बार योग शब्द श्रीकृष्ण (जिनको योगेश्वर श्रीकृष्ण भी कहते हैं) ने अर्जुन को अपने जीवन में असमर्थता पर काबू पाने के लिए प्रदान किया था और गीता में वर्णित 18 अध्याय हमको श्रीकृष्ण द्वारा उल्लेखित योग के बारे में बताते हैं। इन अठारह अध्यायों में से प्रत्येक को अलग-अलग नामों में नामित किया गया है। वहीं भगवान द्वारा रचित प्रत्येक अध्याय हमारे शरीर और दिमाग को प्रशिक्षित करता है।उन्होंने बताया कि गीता के पहले अध्याय में अर्जुन विशाद योग है। चिंतकों को लगा कि कहीं विशाद भी योग बन सकता है।

विशाद को आज की भाषा में डिप्रेशन कहते हैं। उन्होंने कहा कि भागवत गोविंद की वाणी है। ऐसे में भागवत को हमें अपने जीवन में धारण कर उसे व्यवहार व दिनचर्या में लाना चाहिए।  उन्होंने कहा कि धर्म केवल प्रदर्शन की वस्तु नहीं है। हमारे वेदों में कहा गया है कि सत्य बोलो, धर्म को आचरण में लाओ, जब हम अपनी कुंठा को त्याग कर इन बातों पर ध्यान देंगे, तो हमें अपने आप भागवत का ज्ञान मिलना शुरू हो जाएगा। इस दौरान उनके द्वारा प्रस्तुत भजनों पर श्रद्धालु झूमने पर मजबूर हो गए।

वहीं भक्ति के इस महाकुंभ में  उन्होंने भागवत कथा का सार एक वाक्य में समायोजित करते हुए बताया कि जो अपने अंदर की शक्तियों को जागृत कर दे, वही भागवत गीता व कथा है। उन्होंने कहा कि सज्जनता और उदारता के साथ सकारात्मक ऊर्जा का नाम ही संत है। और सही ढंग से जीने का तरीका ही श्री भागवत व गीता ज्ञान है। उन्होंने उपस्थित हजारों की तादाद में बैठी संगत को कहा कि जब भी आपके मन और तन में विकृति उत्पन्न होने लगे, तो भागवत महापुराण के एक श्लोक का भावमय स्मरण करने मात्र से ही मनुष्य सहज हो जाता है, इसलिए हमें श्रीमद् भागवत ज्ञान गंगा का प्रवाह प्रतिदिन पूरे लग्न के साथ सुनना है। इस दौरान जिला के विभिन्न संत समाज मैं भी इस ज्ञान रूपी गंगा में डुबकी लगाई।

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