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रामायण और रामचरित्र मानस हमारे पवित्र ग्रंथ :आचार्य तरुण डोगरा

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झंबर में चल रही श्रीमद्भागवत कथा दूसरे दिन  बाबा सुग्रीवानंद जी महाराज ने दिया भक्तों को आशीर्वाद

ऊना/सुशील पंडित : रामायण और रामचरित मानस हमारे पवित्र ग्रंथ हैं। तुलसीदास जी ने श्री राम को ईश्वर मान कर रामचरितमानस की रचना की है किन्तु आदिकवि वाल्मीकि जी ने अपनी रामायण में श्री राम को मनुष्य ही माना है। यह बात प्रदेश के जिला ऊना उपमंडल के तहत पड़ती ग्राम पंचायत झंबर में 5 अप्रैल से 13 अप्रैल तक चल रहे श्री रामायण महायज्ञ में क्षेत्र के सुप्रसिद्ध कथावाचक आचार्य तरुण डोगरा ने कही। उन्होंने श्रोताओं को बताया कि तुलसीदास जी ने रामचरितमानस को राम के राज्यभिषेक के बाद समाप्त कर दिया है वहीं आदिकवि श्री वाल्मीकि ने अपने रामायण में कथा को आगे श्री राम के महाप्रयाण तक वर्णित किया है।

तरुण डोगरा ने बताया कि महाराजा दशरथ ने पुत्र प्राप्ति हेतु यज्ञ आरंभ करने की ठानी। महाराज की आज्ञानुसार श्यामकर्ण घोड़ा चतुरंगिनी सेना के साथ छुड़वा दिया गया। महाराज दशरथ ने समस्त मनस्वी, तपस्वी, विद्वान ऋषि-मुनियों तथा वेदविज्ञ प्रकाण्ड पण्डितों को यज्ञ सम्पन्न कराने के लिए बुलावा भेज दिया और निश्‍चित समय आने पर समस्त अभ्यागतों के साथ महाराज दशरथ अपने गुरु वशिष्ठ जी तथा अपने परम मित्र अंग देश के अधिपति लोभपाद के जामाता ऋंग ऋषि को लेकर यज्ञ मण्डप में पधारे तथा इस प्रकार महान यज्ञ का विधिवत शुभारंभ किया गया। उन्होंने बताया कि सम्पूर्ण वातावरण वेदों की ऋचाओं के उच्च स्वर में पाठ से गूंजने लगा और समिधा की सुगन्ध से महकने लगा। वहीं समस्त पण्डितों, ब्राह्मणों, ऋषियों आदि को यथोचित धन-धान्य, गौ आदि भेंट कर के सादर विदा करने के साथ यज्ञ की समाप्ति हुई। तदुपरांत राजा दशरथ ने यज्ञ के प्रसाद चरा(खीर) को अपने महल में ले जाकर अपनी तीनों रानियों में वितरित कर दिया। और प्रभु की अपार कृपा दृष्टि से प्रसाद ग्रहण करने के परिणामस्वरूप तीनों रानियों ने गर्भधारण किया।

आचार्य तरुण डोगरा ने बताया कि जब चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को पुनर्वसु नक्षत्र में सूर्य, मंगल शनि, वृहस्पति तथा शुक्र अपने-अपने उच्च स्थानों में विराजमान थे, और कर्क लग्न का उदय होते ही महाराज दशरथ की बड़ी रानी कौशल्या के गर्भ से एक शिशु का जन्म हुआ जो कि नील वर्ण, चुंबकीय आकर्षण वाले, अत्यन्त तेजोमय, परम कान्तिवान तथा अत्यंत सुंदर था। उस शिशु को देखने वाले देखते ही रह जाते थे। इसके पश्चात् शुभ नक्षत्रों और शुभ घड़ी में महारानी कैकेयी के एक तथा तीसरी रानी सुमित्रा के दो तेजस्वी पुत्रों का जन्म हुआ। इस दौरान सम्पूर्ण राज्य में आनन्द मनाया जाने लगा। महाराज दशरथ के चार पुत्रों के जन्म के उल्लास में गन्धर्व गान करने लगे और अप्सराएं नृत्य करने लगीं। देवता अपने विमानों में बैठ कर पुष्प वर्षा करने लगे। महाराज ने उन्मुक्त हस्त से राजद्वार पर आए भाट, चारण तथा आशीर्वाद देने वाले ब्राह्मणों और याचकों को दान दक्षिणा दी। वहीं पुरस्कार में प्रजा-जनों को धन-धान्य तथा दरबारियों को रत्न, आभूषण प्रदान किए। उन्होंने बताया कि चारों पुत्रों का नामकरण संस्कार महर्षि वशिष्ठ के द्वारा किया गया तथा उनके नाम रामचन्द्र, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न रखे गए। इस अवसर पर भगवान श्री राम की पौराणिक कथा को कथा स्थल में बैठे असंख्या श्रोताओं ने शान्त व मंत्रमुग्ध होकर सुना। इस बीच संपूर्ण माहौल भक्ति के रस में डूबा हुआ दिखाई दिया।

श्री श्री 1008 बाबा सुग्रीवानंद जी महाराज ने दिया भक्तों को आशीर्वाद

वहीं, इस धार्मिक वार्षिक अनुष्ठान में स्थानीय भक्तों की पुरजोर इच्छा एवं आस्था पर विश्वविख्यात देवभूमि हिमाचल प्रदेश के जिला ऊना स्थित डेरा बाबा रूद्रानंद  नगरी के अधिष्ठाता श्री श्री 1008 श्री सुग्रीवानंद जी महाराज ने भक्तों की आस्था पर विशेष कृपा दृष्टि करते हुए ग्राम पंचायत झंबर में पहुंचकर हजारों की तादाद में श्रद्धालुओं व भक्तों को आशीर्वाद दिया। इस दौरान कुछ क्षणों के लिए ऐसे लग रहा था मानो कि प्रभु श्री राम के आशीर्वाद से गांव लाम, झंबर व सूरजेहड़ा नगरी राममय एवं गुरुमय में तब्दील हो गई है। इस मौके पर गुरुदेव सुग्रीवानंद जी महाराज ने सभी भक्तों को सुख शांति, समृद्धि व आरोग्य रहने का आशीर्वाद दिया।

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