चंडीगढ़ः पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए एक विवाहित महिला को बिना पति की मंजूरी के गर्भपात कराने के लिए सहमति जताई है। कोर्ट ने साफ किया कि महिला की मर्जी ही सबसे अहम है। कोर्ट ने एक ऐसी महिला की याचिका स्वीकार की जो अपने पति से अलग रह रही थी और गर्भपात कराना चाहती थी। मेडिकल जांच में महिला गर्भपात के लिए पूरी तरह फिट पाई गई थी।
यह मामला पंजाब के फतेहगढ़ साहिब की एक 21 वर्षीय युवती का था। उसने हाईकोर्ट से दूसरी तिमाही में चल रहे अपने गर्भ को समाप्त करने की अनुमति मांगी थी। महिला की शादी मई में हुई थी, लेकिन उसका अपने पति के साथ रिश्ता बहुत खराब चल रहा था। इसी दौरान महिला गर्भवती हो गई और मानसिक तनाव के चलते उसने गर्भपात कराने का फैसला किया। 22 दिसंबर को अदालत ने पीजीआईएमईआर चंडीगढ़ को निर्देश दिए कि वह एक मेडिकल बोर्ड गठित कर महिला की चिकित्सकीय जांच करे और यह बताए कि गर्भपात संभव है या नहीं।
बोर्ड ने 23 दिसंबर को अपनी रिपोर्ट में बताया कि महिला पिछले छह महीनों से अवसाद और चिंता के लक्षणों से पीड़ित है और उसका इलाज चल रहा है, हालांकि उसमें बहुत अधिक सुधार नहीं हुआ है। रिपोर्ट में कहा गया कि महिला तलाक की प्रक्रिया के बीच गर्भावस्था को लेकर गंभीर मानसिक तनाव में है। बोर्ड ने यह भी स्पष्ट किया कि महिला मानसिक रूप से अपनी सहमति देने में सक्षम है और चिकित्सकीय रूप से गर्भपात के लिए फिट है। सभी तथ्यों और मेडिकल रिपोर्ट पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि गर्भ की अवधि 20 सप्ताह से कम है, जो कानून के तहत मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (एमटीपी) की निर्धारित सीमा के भीतर है।
न्यायमूर्ति सहगल ने कहा कि एक विवाहित महिला ही यह तय करने की सबसे अच्छी निर्णायक होती है कि वह गर्भावस्था को जारी रखना चाहती है या उसे समाप्त करना चाहती है। कोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए महिला को पीजीआईएमईआर, चंडीगढ़ या किसी अन्य अधिकृत अस्पताल में एक सप्ताह के भीतर गर्भपात कराने की अनुमति दी और संबंधित अस्पताल को प्रक्रिया के दौरान सभी आवश्यक सावधानियां बरतने के निर्देश दिए।
