Sat, Jan 03, 2025, 20:57:41 PM
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हर-हर महादेव के जयकारों के साथ बंद हुए केदारनाथ के धाम, अब तक इतने श्रद्धालुओं ने किए दर्शन

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नई दिल्ली: भाई दूज के इस पावन मौके पर भगवान केदारनाथ के कपाट वैदिक मंत्रोच्चार और धार्मिक परंपराओं के बीच बंद हो गए हैं। शीतकाल के लिए पूरे विधि-विधान से कपाट बंद कर दिए गए हैं। सुबह 4 बजे से विशेष पूजा-अर्चना की प्रक्रिया शुरु हुई और इसके बाद सुबह 8:30 बजे कपाटों को श्रद्धा और आस्था के साथ बंद कर दिया गया। इस शुभ अवसर में पूरी केदारघाटी में हर-हर महादेव और जय बाबा केदार के जयकारे भी लगाए गए।

कपाट बंद होने के इस पावन मौके पर उत्तराखंड के सीएम पुष्कर सिंह धामी भी केदारनाथ धाम दर्शनों के लिए पहुंचे। इस दौरान उन्होंने राज्य की सुख-समृद्धि की कामना की। उन्होंने कहा कि बाबा केदार की कृपा से उत्तराखंड लगातार प्रगति के पथ पर आगे बढ़ता जा रहा है।

मंत्रोच्चार और जयकारों के बीच बंद हुए कपाट

कपाट बंद होने से पहले बुधवार को भगवान केदारनाथ की पंचमुखी चल विग्रह डोली को मंदिर के सभामंडप में विराजमान किया गया था। ऐसे में आज सुबह डोली को सभामंडप से बाहर लाया गया और मंदिर की परिक्रमा करवाई गई। परिक्रमा पूरी होने के बाद मंत्रोच्चार और जयकारों के बीच कपाट बंद कर दिए गए। इसके बाद बाबा की डोली रात्रि प्रवास के लिए रामपुर में रवाना हुई। अब अगले छ: महीने तक भगवान केदारनाथ की पूजा ऊखीमठ स्थित शीतकालीन गद्दीस्थल ओंकारेश्वर मंदिर में की जाएगी।

फूलों से सजाया गया मंदिर

कपाट बंद होने के इस खास मौके पर मंदिर को तरह-तरह के फूलों से सजाया गया था। श्रद्धालुओं ने इस दिव्य दृश्य के दर्शन किए और बाबा केदार के चरणों में नमन किया। इस मौके पर कई लोग मौजूद रहे।

 अब तक इतने श्रद्धालुओं ने किए दर्शऩ

इस साल केदारनाथ यात्रा काफी सफल रही। यात्रा के दौरान कुल 17.39 लाख श्रद्धालुओं को बाबा केदार के दर्शन करने का सौभाग्य मिला। कपाट बंद होने की पहली शाम तक भी पांच हजार से ज्यादा श्रद्धालु धाम में पहुंचे थे। अब धाम में कड़ाके की ठंड शुरु हो गई है। बुधवार दोपहर यहां घोना कोहरा छाया हुआ दिखाई दिया था। इसके कारण तीर्थयात्रियों को शाम ढलते ही अपने ठहराव स्थानों पर जाना पड़ा। इसी क्रम में आज दोपहर 12:30 बजे मां यमुना के यमुनोत्री मंदिर के कपाट भी शीतकाल के लिए बंद किए जाएंगे। इसके बाद मां यमुना की उत्सव मूर्ति को पारंपरिक डोली में खरसाली गांव में लाया जाएगा। जहां सर्दियों में उनकी पूजा-अर्चना की जाएगी।

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