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गलती हो जाए तो प्रायश्चित जरूर करें : गणेश दत्त शास्त्री

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दूसरे दिन बदोली में श्रीमद् भागवत कथा का हुआ भव्य आयोजन 

ऊना/सुशील पंडित: गांव बदोली में श्रीमद् भागवत कथा का सोमवार को दूसरा दिवस था। गांव के ठाकुरद्वारा प्रांगण में हो रहे इस आयोजन में दूसरे दिवस पर गणेश वंदना,हनुमान चालीसा एवं दिव्य मंत्रो के साथ श्रीमद भागवत कथा की शुरुआत की गई। भागवत कथा के दूसरे दिन शुकदेव के बारे में वर्णन करते हुए अंदौरा से पधारे कथा व्यास गणेश दत्त शास्त्री जी ने कहा कि श्रीमद्भागवत की अमर कथा एवं शुकदेव के जन्म का विस्तार से वर्णन कर वताया कि कैसे भगवान ने शुकदेव महाराज को धरती पर भेजा। भागवत कथा गायन करने को ताकि कलियुग के लोगों का कल्याण हो सके।

गणेश दत्त शास्त्री जी ने कथा वाचन करते हुए कहा कि भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत में कहा है कि जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण भागवत कथा पृथ्वी के लोगों को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और न ही बदले जा सकते हैं।शुकदेव जी के जन्म के बारे में यह कहा जाता है कि ये महर्षि वेद व्यास के अयोनिज पुत्र थे और यह बारह वर्ष तक माता के गर्भ में रहे।

भगवान शिवजी माता पार्वती को अमर कथा सुना रहे थे। पार्वती जी को कथा सुनते-सुनते नींद आ गयी और उनकी जगह पर वहां बैठे शुकदेव जी ने हुंकारी भरना प्रारम्भ कर दिया। जब भगवान शिव को यह बात ज्ञात हुई, तब भगवान शिवजी क्रोधित होकर शुकदेव को मारने के लिये दौड़े और उनके पीछे अपना त्रिशूल छोड़ा। शुकदेव जान बचाने के लिए तीनों लोकों में भागते रहे भागते-भागते वह व्यास जी के आश्रम में पहुंचे यहां वेदव्यास जी की पत्नी जो कि जिमाई मुद्रा में थी तव वह नन्ना शुक सूक्ष्मरूप बनाकर उनकी पत्नी के मुख से उदर में प्रवेश कर गए। ऐसा कहा जाता है कि वह बारह वर्ष तक गर्भ के बाहर ही नहीं निकले।

जब भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं आकर इन्हें आश्वासन दिया कि बाहर निकलने पर तुम्हारे ऊपर माया का प्रभाव नहीं पड़ेगा, तभी शुकदेव गर्भ से बाहर निकले और व्यासजी के पुत्र कहलाये। गर्भ में ही इन्हें वेद, उपनिषद, दर्शन और पुराण आदि का सम्यक ज्ञान हो गया था। जन्म लेते ही ये बाल्य अवस्था में ही तप हेतु वन की ओर भागे, ऐसी उनकी संसार से विरक्त भावनाएं थी। परंतु वात्सल्य भाव से रोते हुए व्यास भी उनके पीछे भागे। मार्ग में एक जलाशय में कुछ कन्याएं स्नान कर रही थीं, उन्होंने जब शुकदेव महाराज को देखा तो अपनी अवस्था का ध्यान न रख कर शुकदेव का आशीर्वाद लिया। लेकिन जब शुकदेव के पीछे मोह में पड़े व्यास वहां पहुंचे तो सारी कन्याएं छुप गयीं। ऐसी सांसारिक विरक्ति से शुकदेव महाराज ने तप प्रारम्भ किया। उसके उपरांत कथा व्यास ने मनुष्य को छ; ऐसे प्रश्नों के बारे में भी बताया जिससे उसका कल्याण हो सके। इस श्रीमद् भागवत ज्ञान गंगा में गोता लगाने के लिए गांव निवासी और बाहर से लोग भी पधारे हुए थे।

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