Naxalism: भारत में वामपंथी उग्रवाद के खिलाफ चल रही लंबी लड़ाई अब निर्णायक मोड़ पर पहुंचती दिख रही है। केंद्र सरकार की सख्त सुरक्षा नीति, विकासात्मक पहल और पुनर्वास कार्यक्रमों के संयुक्त प्रभाव से नक्सलवाद को बड़ा झटका लगा है। पिछले एक दशक में 10,000 से अधिक माओवादी कैडरों का आत्मसमर्पण इस बात का संकेत है कि आंदोलन की पकड़ कमजोर पड़ रही है। वर्ष 2025 में 2,300 उग्रवादियों ने हथियार डाले, जबकि 2026 के शुरुआती तीन महीनों में ही 630 से अधिक लोगों ने मुख्यधारा का रास्ता चुना।
प्रशासन की पहुंच हुई मजबूत
सरकार की रणनीति केवल सैन्य कार्रवाई तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसे एक व्यापक दृष्टिकोण के साथ लागू किया गया। “रेड कॉरिडोर” के दुर्गम इलाकों में सड़क निर्माण, पुलों का विकास और सुरक्षा बलों की पहुंच बढ़ाने से उग्रवादियों के गढ़ों को तोड़ा गया। पिछले दस वर्षों में 15,000 किलोमीटर से अधिक सड़कों का निर्माण हुआ है, जिससे दूरदराज के क्षेत्रों में प्रशासन की पहुंच मजबूत हुई है।
नक्सली हिंसा में गिरावट
सुरक्षा ढांचे को भी व्यापक रूप से मजबूत किया गया है। किलेबंद पुलिस स्टेशनों की संख्या में कई गुना वृद्धि हुई है और पिछले छह वर्षों में 361 नए सुरक्षा शिविर स्थापित किए गए हैं। इससे न केवल उग्रवादी गतिविधियों पर अंकुश लगा है, बल्कि आम नागरिकों में सुरक्षा की भावना भी बढ़ी है। परिणामस्वरूप, नक्सली हिंसा से प्रभावित जिलों और घटनाओं में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है।
उग्रवादी संगठनों में भर्ती हुई कम
विकास योजनाओं का प्रभाव भी स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। आवास, स्वास्थ्य और पहचान से जुड़ी सरकारी योजनाओं का लाभ अब उन इलाकों तक पहुंच रहा है, जहां पहले प्रशासन की मौजूदगी सीमित थी। शिक्षा के क्षेत्र में एकलव्य विद्यालयों और कौशल विकास केंद्रों की स्थापना ने युवाओं को रोजगार के नए अवसर दिए हैं, जिससे उग्रवादी संगठनों में भर्ती कम हुई है।
आत्मसमर्पण और पुनर्वास नीति
इसके अलावा, जांच एजेंसियों द्वारा वित्तीय नेटवर्क पर कार्रवाई ने भी नक्सली संगठनों को कमजोर किया है। आत्मसमर्पण और पुनर्वास नीति के तहत आर्थिक सहायता, प्रशिक्षण और पुनर्वास सुविधाओं ने उग्रवाद छोड़ने वालों में विश्वास पैदा किया है।