दिल्ली के एम्स (AIIMS) में इच्छामृत्यु की प्रक्रिया के तहत हरीश राणा का निधन हो गया। सुप्रीम कोर्ट से मंजूरी मिलने के बाद डॉक्टरों की निगरानी में उनका इलाज सीमित किया गया और धीरे-धीरे उनकी जीवन रक्षक प्रक्रिया बंद की गई। कुछ दिनों पहले उनका पोषण (खाना-पीना) भी धीरे-धीरे रोक दिया गया था, जिसके बाद उन्होंने अंतिम सांस ली।
13 साल से कोमा में थे हरीश
हरीश राणा पिछले करीब 13 साल से कोमा में थे। एक हादसे में छत से गिरने के कारण उनके सिर में गंभीर चोट लग गई थी, जिसके बाद वे कभी होश में नहीं आ सके। उनके परिवार ने देश के कई बड़े अस्पतालों में इलाज करवाया, लेकिन कोई सुधार नहीं हुआ। डॉक्टरों ने भी साफ कह दिया था कि उनके ठीक होने की संभावना बहुत कम है।
आर्थिक बोझ बना बड़ी समस्या
हरीश के इलाज पर हर महीने लगभग 60 से 70 हजार रुपये खर्च हो रहे थे। लंबे समय तक इलाज चलने के कारण परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत कमजोर हो गई थी। जब उम्मीद पूरी तरह खत्म हो गई, तब उनके माता-पिता ने सुप्रीम कोर्ट में इच्छामृत्यु की अनुमति के लिए याचिका दायर की।
सुप्रीम कोर्ट से मिली मंजूरी
कोर्ट ने सभी मेडिकल रिपोर्ट और स्थिति को देखते हुए इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह मामला इसलिए भी खास माना जा रहा है क्योंकि भारत में इस तरह के मामलों में सख्त नियमों का पालन किया जाता है।
एम्स में डॉक्टरों की निगरानी में हुआ पूरा प्रोसेस
हरीश को दिल्ली के एम्स अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहां उन्हें पैलिएटिव केयर (Palliative Care) विभाग में रखा गया। डॉक्टरों की टीम लगातार उनकी स्थिति पर नजर रख रही थी। सबसे पहले उनका पोषण धीरे-धीरे बंद किया गया, फिर अन्य मेडिकल प्रक्रियाएं भी सीमित की गईं, ताकि उन्हें किसी तरह का दर्द न हो।
क्या होती है इच्छामृत्यु (Euthanasia)?
इच्छामृत्यु का मतलब है ऐसी स्थिति में इलाज को रोकना या सीमित करना, जब मरीज के ठीक होने की कोई उम्मीद नहीं होती। भारत में यह प्रक्रिया केवल सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुसार ही की जा सकती है। इसके लिए कुछ जरूरी शर्तें होती हैं।
- मरीज के ठीक होने की संभावना बहुत कम हो
- परिवार की सहमति हो
- डॉक्टरों की टीम की मंजूरी हो
- पूरी प्रक्रिया में यह ध्यान रखा जाता है कि मरीज को दर्द न हो
इस दौरान मरीज को आराम देने के लिए दवाएं दी जाती हैं और धीरे-धीरे जीवन बनाए रखने वाली सुविधाएं हटाई जाती हैं।
एक भावुक और कठिन फैसला
यह मामला न सिर्फ कानूनी बल्कि भावनात्मक रूप से भी बेहद कठिन था। परिवार ने 13 साल तक हर संभव कोशिश की, लेकिन जब उम्मीद खत्म हो गई, तब उन्होंने यह कठिन निर्णय लिया।
